मिर्जापुर। कभी पीतल नगरी के नाम से मशहूर रहे मिर्जापुर की सैकड़ो वर्ष पुरानी नगर पालिका शहर में मेटल जोन बनाने में सफल नहीं हो सकी। यह हाल तब है जब शहर के बीचोबीच के कई इलाकों में दिन रात पीतल के बर्तन बनाने के लिए रोलर चलते रहते हैं। शहर के 25 हजार से अधिक मतदाता पीतल बर्तन उद्योग से जुड़े हैं लेकिन इनकी सुविधाओं पर किसी भी पालिकाध्यक्ष का ध्यान नहीं गया जबकि केंद्र में भाजपा और कांग्रेस की सरकारों के रहते पालिकाध्यक्ष भी इन्हीं दलों.के रहे।
मिर्जापुर को बरसों से पीतल उद्योग और दरी, कालीन उद्योग के लिए जाना जाता रहा है। दूर दराज के लोग यहां पीतल के बर्तन की खरीददारी करने के लिए पहुंचते रहे। आज भी यहां बने गगरे और परात बंगाल और बिहार तक बिकने जाते हैं लेकिन इन्हें बनाने वालों के दिन नहीं बहुरे। शहर के दुर्गादेवी मोहल्ला, कसरहट्टी, सोनवर्षा, बभनइया, गुदरी, साधवाड़ा आदि इलाकों में दिन भर बर्तनों पर हथौड़े के वार होते रहते हैं जिससे ये इलाके कभी सोना बरसाते थे लेकिन इन गलियों में रहने वालों के दिन नहीं बहुरे। इन्हें आज भी हथौड़ी की ठक-ठक के बीच दिन गुजारना पड़ता है। बर्तन के कच्चे माल को गलाने के लिए जलाई गई भट्ठियों से निकलने वाला धुआं लोगों को सांस और टयूबरक्लोसिस जैसी बीमारियां बांट रहे हैं। फिर भी इन इलाकों में रहना लोगों की मजबूरी बनी हुई है। नगरपालिका के अध्यक्षों ने कभी अपने नागरिकों की इन समस्याओं की ओर ध्यान नहीं दिया। यदि रिहायशी गलियों से बाहर कहीं मेटल जोन बनाया गया होता तो नागरिकों को ध्वनि और वायु प्रदूषण से निजात मिल जाती और व्यवसाय के लिए व्यापारियों को खुला स्थान मिल गया होता जहां बाहर से आने वाला व्यापारी भी सुकून से माल की खरीददारी कर सकता था। नगरपालिका का अध्यक्ष होने के लिए प्रत्याशी इन गलियों में खूब धमा चौकड़ी मचाते हैं लेकिन कुर्सी पर बैठने के बाद किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया। नगर पालिका के अध्यक्षों ने केंद्र और राज्य सरकारों को कभी भी मेटल जोन बनाने के लिए प्रस्ताव बना कर नहीं भेजा, जबकि कई बार कांग्रेस और भाजपा के नेता अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान रहे और इस दौरान ये दोनों राष्ट्रीय दल केंद्र में सत्तारूढ थे।