मड़िहान (मिर्जापुर)। श्रीमद्भागवत कथा में छठें दिन कथा वाचक जगदीशानंद महाराज ने गोपी प्रसंग की व्याख्या करते हुए कहा कि काम लीला नहीं, काम विजय लीला है। काम को हराना कोई विशिष्ट बात नहीं। गोपियों के मध्य रहकर भगवान कृष्ण काम को वश में रखा। साधन सिद्धा, ऋषि रूपा, अन्य पूर्वा, अनन्य पूर्वा आदि एक से बढ़कर एक गोपियां थी। कृष्ण की प्रियतम रास राजेश्वरी, बृषभान नंदिनी महारास में भगवान का अधरामृत पान कर रही हैं। भगवान को पाने के लिए धर्म रूपी सीढ़ी चढ़कर कठिन परिश्रम के बाद क्रमश: आगे बढ़ना होगा। जीव के अंदर ऐसी भावना होगी तभी परमात्मा की चरणों का दर्शन होगा।
कथा वाचक ने कहा साहित्य, संगीत और नृत्य के समन्वय को रास कहते हैं। महाराज ने कथा में बताया कि जिसके मन में अहंकार हो और जीवन में वैराग्य हो उसे उद्धव कहते हैं। जिसके सामने ज्ञान में प्रेम जीवन में नेम हो उसे गोपी कहते हैं। उद्धव जी जैसे ही ब्रज मंडल में प्रवेश किए तो वन की सघन कुंज विरान हो गई। यमुना का जल नीला पड़ गया। मां यशोदा नंद की आंखें झील की तरह झरने लगती है। जब जीव कृष्ण बिरह में व्याकुल उसकी आंखें बरसेगी तब अंदर की मलिनता धुलेगी। कथा के अंत में भक्तों को प्रसाद वितरण किया गया। संगीतकार बृंदावन आचार्य पंडित बालमुकुंद द्विवेदी, आर्गन पर अनिल भरद्वाज, पैड संगत संजय सिंह, तबलावादक अनिल सोनी, आचार्य मोहन लाल तिवारी, व्यासगद्दी राम प्रसाद तिवारी मौजूद रहे। इस अवसर पर अध्यक्ष गोपाल सेठ, प्रबंधक राजेश सिंह, ओपी सिंह, बीनू चौरसिया, संरक्षक जनार्दन सिंह कार्यक्रम व्यवस्थापक कन्हैया लाल सेठ, सूर्यप्रताप सिंह, रमेश मिश्रा, चंदा गुरु आदि मौजूद रहे।