मिर्जापुर। आधुनिकता और उपेक्षा के चलते कुश्ती की परंपरा चित होती जा रही है। बैडमिंटन, फुटबाल, हाकी एवं क्रिकेट आदि खेलों को बढ़ावा दिए जाने के कारण गांवों का खेल कुश्ती उपेक्षा का शिकार हो गया है। स्कूलों से अखाड़े और किताबों से पहलवानों की कहानियां लुप्त होती जा रही हैं। कभी पहलवानों के दांव-पेच से जिले के अखाड़ों की रौनक देखते बनती थी वहीं वर्तमान में कुछ को छोड़ कई अखाड़ों पर ग्रहण लग गया है।
जिले में अब कुछ गिनी-चुनी संस्थाओं व अखाड़ों की ओर से नाग पंचमी व दीपावली पर कुश्ती-दंगल का आयोजन कराया जाता है। कुश्ती के उत्थान के लिए सरकार की तरफ से किसी प्रकार की मदद नहीं मिलती है जिससे अखाड़ों की पहचान मिटती चली जा रही है। कई अखाड़ों में पहलवानों के अभ्यास के लिए सामान आदि की कमी के चलते भी युवाओं का रुझान नहीं रह गया है। गांवों में अखाड़ों की वर्तमान स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती है। परंपरा के अनुसार कुछ अखाड़ों की देखरेख करने वाले लोग कुछ अखाड़ों में हनुमान जी का पूजन व कुश्ती-दंगल का अभ्यास तो करते हैं। बैडमिंटन, फुटबाल, हाकी एवं क्रिकेट आदि खेलों को बढ़ावा दिए जाने से कुश्ती-दंगल पर ग्रहण लग गया है। नगर क्षेत्र के भटवा की पोखरी मुहल्ला स्थित दुक्खी के अखाड़ा उपेक्षा का दंश झेल रहा है। वहीं नगर के उपाध्याय की पोखरी सहित बदलीघाट, शुक्लहा, कजरहवा का पोखरा, महंत के शिवाला, रूखड़घाट एवं ओझला के पुल पर स्थित प्राचीन अखाड़ों पर नाग पंचमी पर कुश्ती-दंगल का आयोजन कराया जाता है। इन अखाड़ों के विकास व विस्तार के लिए शासन-प्रशासन की तरफ से कोई मदद नहीं मिलती है, जिससे नए युवा पहलवान आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।
किशुन पहलवान ने बताया कि पहले की कुश्ती-दंगल और वर्तमान की कुश्ती-दंगल में बहुत अंतर आ गया है। पहले पहलवानों के लिए तमाम सुविधाएं मिलती थी, लेकिन अब वह बात नहीं हैं।
- मुरलीधर पहलवान का कहना है कि परंपरा का निर्वहन करते हुए नगर के करीब 15 बच्चे अखाड़े में नियमित अभ्यास करते हैं। अखाड़े में सैकड़ों साल पुराना नौ फीट का मलखम सहित डंबल, जोड़ी आदि से बच्चे अभ्यास करते हैं। अगर सरकारी मदद मिल जाए तो स्थिति में बदलाव आ सकता है। - बब्बू पहलवान ने बताया कि नाग पंचमी पर अखाड़े में विराट कुश्ती दंगल का आयोजन होता है, जिसमें सभी बच्चे बढ़चढ़ कर प्रतिभाग करते हें। इस अखाड़ के स्थानीय के साथ ही वाराणसी और इलाहाबाद भी कुश्ती व दंगल में हिस्सा लेते हैं। संसाधन की कमी से पहलवानों को परेशानी हो रही है।
- अमन पहलवान (19) का कहना है कि यदि सरकारी मदद अखाड़ों को मिले तो यहां के पहलवान देश विदेश में अपना परचम लहरा सकते हैं। पैसे के अभाव में न तो अखाड़े ही सही देखरेख हो पाती है और न ही बच्चों को पौष्टिक आहार ही मुहैया हो पाती है। वर्तमान में किसी तरह परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है।