संगम में डुबकी लगाने को आतुर लोगों के पग पैदल चलने में जरा भी नहीं डगमगाए। सुरक्षा के लिहाज से मेला क्षेत्र से सिर्फ पैदल आने वालों को ही प्रवेश मिला। इसके लिए शहर के बड़े हिस्से में यातायात प्रतिबंधित किया गया। संगम की तरफ आने वाली सभी सड़कों पर कई किलोमीटर पहले से वाहनों का प्रवेश बंद कर दिया लेकिन यह आस्था ही है जिसने संगम तक की दूरी पल में पूरी करा दी।
संगम पर आस्था का ऐसा जनसैलाब उमड़ा जिसे रोकना किसी के बस में नहीं था। तभी तो रेल से सैकड़ों मील का सफर तय कर यहां अकेली पहुंची 62 वर्षीय शारदा नित्यानंद को इलाहाबाद जंक्शन से संगम तक आने के लिए दस किलोमीटर से अधिक पैदल चलना पड़ा लेकिन उन्हें जरा भी नहीं अखरा। मध्य प्रदेश के गुना से आई शारदा भोर में साढ़े चार बजे संगम पर डुबकी लगाने पहुंच गईं। यही स्थिति महाराष्ट्र के कोल्हापुर से पत्नी के साथ आए 70 वर्षीय मलुक कृष्णगोपाल की रही।
पत्नी के कंधे पर टंगे सफेद रंग के झोड़े में जरूरत भर का सामान और मलुक के हाथ में दो कंबल। कुल इतने सामान के साथ दोनों हजारों किलोमीटर दूर का सफर पूरा कर इलाहाबाद पहुंचे तो जंक्शन से बाहर निकलकर लीडर रोड, रामबाग होकर पैदल संगम पहुंचे। सुबह आठ बजे संगम स्नान के बाद उन्होंने वहीं कुछ देर विश्राम करने के बाद वापसी की भी राह पकड़ ली।
शारदा, मलुक जैसे गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश से आए हजारों श्रद्धालुओं ने देर रात से सोमवार पूरे दिन संगम में डुबकी लगाई। ऐसे श्रद्धालुओं की संख्या भी काफी रही जो रविवार को रात आठ-नौ बजे ही संगम क्षेत्र पहुंच गए। उन्हें भोर में गंगा स्नान करना था सो परेड मैदान से लेकर संगम नोज तक जिसे जहां जगह मिली, जमीन पर पन्नी, चादर बिछाई और कंबल तान कर सो गए। भोर में स्नान के बाद वह भी हर-हर गंगे के जयघोष के साथ रवाना हो गए।