हस्तिनापुर के पांडव टीले स्थित प्राचीन जयंती माता मंदिर में शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन मां कूष्मांडा की विधिविधान से पूजा-अर्चना की गई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। पूजा से रोग, दोष और दुख दूर होने की मान्यता है।
हस्तिनापुर। पांडव टीले पर स्थित प्राचीन जयंती माता शक्तिपीठ मंदिर में शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन और चतुर्थी तिथि पर मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा की गई। श्रद्धालुओं ने मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना की।
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मंदिर संस्थापक अध्यक्ष सुदेश कुमार ने बताया कि शुक्रवार को भक्त मां कूष्मांडा की पूजा विधिविधान से की गई। सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग में इस बार कुछ पंचांग में तृतीया तिथि दो दिन थी तो कुछ पंचांग में चतुर्थी तिथि दो दिन रही। ऐसे में आज पांचवें दिन चतुर्थी को मां कूष्मांडा की पूजा की जा रही है। मां कूष्मांडा आठ भुजाओं वाली देवी हैं, जिनका वाहन शेर है। मां कूष्मांडा को साहस और अद्भुत शक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनके पास पूरी सृष्टि के सृजन की क्षमता है। चौथी नवदुर्गा की शक्तियों को देखकर ही उनका नाम कूष्मांडा पड़ा, जो सृजन की देवी हैं। मां कूष्मांडा की पूजा करने से रोग, दोष, दुख आदि का नाश होता है। यश और कीर्ति मिलती है। जीवन के हर संकट दूर होते हैं। आचार्य मुकेश शांडिल्य, कृष्ण सैनी, सीमा गुर्जर, ज्योति शर्मा, मोहित शर्मा, विशु शर्मा, चंद्र प्रकाश शुक्ला आदि मौजूद रहे।