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फुदक-फुदककर... आ मेरी गौरैया आ

Sun, 20 Mar 2016 02:15 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ
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गौरैया - फोटो : फाइल फोटो
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सूने घरौंदे करें पुकार, गौरेया आओ यहां ठिकाना बनाओ। आंगन में फुदकने वाली गौरेया से फ्लैट की संस्कृति ने आंगन छीन लिया। विकास की आंधी में उसके पेड़ों की टहनियां छूटती गईं। उदास, निराश गौरैया जाए तो जाए कहां। आशियाने को तरसती गौरेया धीरे-धीरे इंसानी आंखों से ओझल होती गई। लेकिन शहर में कुछ ऐसे विश्वकर्मा भी हैं, जिन्होंने आंखों से ओझल होती गौरैया को बचाने के लिए करोड़ों की कीमत वाली कोठियों की शोभा को ताक पर रख दिया। फ्लैट संस्कृति में अपने लिए संरक्षण मांगती गौरैया की करुण पुकार इन लोगों को भावुक कर गई। इन्होंने गौरैया को अपने घर में ठिकाना दिया। उसके लिए सुंदर आशियाना बनवाया। विश्व गौरैया दिवस के मौके पर ऐसे ही लोगों से आपको रू-ब-रू कराती रिपोर्ट।
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ठंडी छांव देने की पीढ़ियों से परंपरा
रेलवे रोड निवासी अंकुर जैन के घर के बाहर सालों पुराना पीपल का पेड़ है। जैना ज्वैलर्स के संचालक अंकुर के परिजनों ने इस पेड़ पर गौरैया के लिए लगभग 50 मिट्टी के घरौंदे टांग रखे हैं। अंकुर बताते हैं कि बुजुर्गों के दौर से हमारे यहां गौरैया को बचाने की परंपरा है। हमारा बचपन इन घरौंदों में गौरैया को देखकर ही बीता है। अब हमारे बच्चे इन घरौंदे में गौरैया देखते हैं। घर के सामने पेड़ होने के कारण घर बहुत गंदा होता है। गौरैया भी गंदगी फैलाती है, लेकिन हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है। अंकुर ने बताया कि मिट्टी के ये घरौंदे गुड़गांव से लाते हैं, हर साल इन्हें पेंट कराते हैं। आंधी से कई बार घरौंदे गिर जाते हैं तो उन्हें दोबारा टंगवाते हैं। मिट्टी के घर में गौरैया को ठंडक मिलती है। सड़क से गुजरने वाले हर राहगीर के लिए पीपल का यह पेड़ आकर्षण का केंद्र बन चुका है।

गौरैया आती है, पेड़ नहीं कटवाऊंगी
लालकुर्ती रजबन बाजार निवासी मिथलेश गौड़ के घर में आम, जामुन और अमरूद के पेड़ हैं। नाती-पोते वाली मिथलेश कहती हैं सालों पहले जब यह मकान खरीदा था, तब से पेड़ हैं। इसके बाद हमने मकान को अपने हिसाब से बनवाया। उस समय बहुत मुश्किल आई, क्योंकि ये तीनों पेड़ घर के अंदर आ रहे थे। कई बार सोचा कि इन्हें कटवाकर अच्छे से घर बनवा लें। बेटों ने भी कहा, लेकिन मेरा मन नहीं हुआ। क्योंकि इन पेड़ों पर मैंने सैकड़ों गौरैया, तोते देखे थे। जब भी मैं इन पक्षियों को देखती थी तो मन को बड़ा सुकून मिलता था। मिथलेश के घर में आज भी तीन पेड़ लहलहा रहे हैं। जिनके कारण छत और आंगन में दिन भर गौरैया, गिलहरी, तोते और दूसरी चिड़िया आती हैं। मिथलेश दिनभर पक्षियाें को दाना डालती हैं।
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