मेरठ। पार्किंसंस रोग अब केवल बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े लोगों की समस्या नहीं रह गया है। ताजा आंकड़े और विशेषज्ञों की राय चौंकाने वाली है अब 35 से 40 साल के युवा भी इस गंभीर न्यूरोलॉजिकल विकार का शिकार हो रहे हैं। बदलती जीवनशैली और पर्यावरणीय कारक युवाओं के मस्तिष्क पर भारी पड़ रहे हैं।
वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विनोद अरोड़ा के अनुसार पार्किंसंस एक न्यूरोडीजेनेरेटिव विकार है। यह तब होता है जब मस्तिष्क के सबस्टैंशिया नाइग्रा क्षेत्र की तंत्रिका कोशिकाएं डोपामाइन नामक रसायन का उत्पादन कम कर देती हैं। यह रसायन शरीर की गति, समन्वय और मांसपेशियों की सक्रियता के लिए अनिवार्य है। डॉ. अरोड़ा बताते हैं कि हालांकि यह बीमारी उम्रदराज लोगों में अधिक होती है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में 35-40 वर्ष की आयु के युवाओं में इसके लक्षणों का मिलना बेहद चिंताजनक है। इसका उपचार लंबा चलता है ताकि लक्षणों को नियंत्रित रखा जा सके।
वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. तनुराज सिरोही बताते हैं कि डोपामाइन की कमी होने पर शरीर कई संकेत देने लगता है जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इनमें हाथ-पैरों में कंपन होना (ट्रेमर), मांसपेशियों में जकड़न और अकड़न, शारीरिक गति का धीमा पड़ना, शरीर का संतुलन बिगड़ने लगना, चेहरे पर भावहीनता आ जाना जैसे लक्षण शामिल है। डॉ. सिरोही के अनुसार वैश्विक स्तर पर पार्किंसंस के मामले 1990 के मुकाबले दोगुने हो चुके हैं और आशंका है कि 2040 तक यह संख्या फिर से दोगुनी हो जाएगी।
युवाओं में बढ़ते मामलों के पीछे मुख्य कारण
जिला चिकित्सालय के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. योगेश अग्रवाल ने युवाओं में इस बीमारी के बढ़ने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण गिनाए हैं:। उन्होंने बताया कि युवाओं में पार्किन जीन म्यूटेशन जैसे आनुवंशिक कारक बड़ी भूमिका निभाते हैं,लेकिन साथ ही पर्यावरणीय विष भी उतने ही जिम्मेदार हैं। लगातार मानसिक तनाव शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन पैदा करता है जो सीधे तंत्रिकाओं को नुकसान पहुंचाता है।
उन्होंने बताया कि अनियमित खान-पान, प्रोसेस्ड फूड, अधिक चीनी और ट्रांस फैट का सेवन हमारे गट माइक्रोबायोम (आंत के बैक्टीरिया) को बिगाड़ देता है। चूंकि मस्तिष्क और आंत का गहरा संबंध होता है इसलिए पेट की खराबी मस्तिष्क रोगों का कारण बनती है। डॉ. अग्रवाल के अनुसार एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग भी आंत के बैक्टीरिया को बदलकर पार्किंसंस का जोखिम बढ़ा सकता है। हवा में जहर और खेती में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक व औद्योगिक सॉल्वेंट्स भी युवाओं के तंत्रिका तंत्र को कमजोर कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं के साथ-साथ जीवनशैली में सुधार ही इस बीमारी से बचने का एकमात्र रास्ता है।
बचाव और सतर्कता
आहार में मेडिटेरेनियन डाइट जैसे फल, सब्जियां, साबुत अनाज और स्वस्थ वसा शामिल करें।
योग और एक्सरसाइज को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।
मानसिक शांति के लिए ध्यान करें।
एंटीबायोटिक्स का प्रयोग बिना डॉक्टरी सलाह के न करें।
शुरुआती चेतावनी को पहचानें
विशेषज्ञों के अनुसार यदि आपकी लिखावट छोटी होने लगे, आवाज में बदलाव आए या नींद से जुड़ी समस्याएं बढ़ जाएं तो इसे हल्के में न लें। ये पार्किंसंस के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं। तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से संपर्क करें।