मवाना। नुकसान के चलते अधिकतर किसानों ने चना, बाजरा, मक्का व कपास आदि समेत अन्य फसलें की खेती करना छोड़ दिया है। अब वे गन्ना एवं गेहूं की फसल पर ही निर्भर हैं। किसानों का कहना है कि गन्ने की खेती पक्की खेती है तथा इसमें नुकसान न के बराबर है।
क्षेत्र में किसान गेहूं, चना, मटर, बाजरा, मक्का एवं कपास आदि की खेती किया करते थे। समय के साथ किसान का मोह चना, मक्का, मटर, कपास एवं बाजरा आदि खेती से भंग होता चला गया तथा किसान पूरी तरह गन्ना एवं गेहूं की खेती पर निर्भर हो गया है। इसके पीछे किसानों का मानना है कि गन्ने की खेती पक्की खेती है तथा गेहूं अपने लिए पैदा करना पड़ता है। हालांकि चना, बाजरा, मक्का आदि के दाम आसमान छू रहे हैं।
गांव पलड़ा निवासी बीर सिंह पुत्र प्रकाश का कहना है कि उन्होंने 20 बीघा में गन्ना बोया हुआ है। गन्ने की खेती पक्की मानी जाती है। इसमें नुकसान न के बराबर है। जबकि चना, मटरा, मक्का, बाजरा की खेती की बहुत चौकसी करनी पड़ती है। जानवरों के साथ-साथ लोग भी इनमें नुकसान पहुंचाते हैं। इसी कारण धीरे-धीरे किसान कम बोने लगे हैं। कम किसानों के बोने के कारण नुकसान और ज्यादा होता है।
वहीं, अकबरपुर निवासी उदयवीर का कहना है कि उन्होंने 35 बीघा गन्ना बो रखा है। चना, कपास, मक्का, बाजरा आदि की फसलों को नील गाय, पहाड़ा, जंगली शूकर, आवारा गोवंश आदि बहुत अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। इनसे गेहूं की फसल को बचाना ही भारी पड़ रहा है।
गांव जयसिंहपुर निवासी रोहित का कहना है कि उनके क्षेत्र में गन्ना गेहूं के साथ-साथ आलू की फसल भी काफी बोई जाती है। अधिकतर किसान गन्ने की फसल को ही पसंद करते हैं। अन्य फसलों में जंगली जानवरों के साथ साथ लोग भी नुकसान करते हैं।
मवाना निवासी सतीश चौहान ने बताया कि उन्होंने 40 बीघा में गन्ने की फसल बोई है। उनका कहना है कि कुछ वर्ष पहले आलू की फसल बोई थी। कोल्ड स्टोरेज में रखे आलू का किराया भी जेब से भरा था। तब से उन्होंने और फसल से तौबा कर ली है।