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कोठे से निकल तो गई अब बेटी को पाने की जद्दोजहद

Mon, 23 Oct 2017 11:26 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ गजेंद्र चौधरी, मेरठ
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काजल कैसे पहचानेगी अपनी बेटी को - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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फिल्मी नहीं, असली है काजल (बदला हुआ नाम) की यह कहानी। इस कहानी में इतने टर्न और किरदारों के बदलते मुखौटे हैं, जिस पर आप आसानी से यकीन नहीं  कर पाएंगे।
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कहानी शुरू होती है सन् 2006 से। 13 साल की काजल कोलकाता में छठी कक्षा की छात्रा थी। दो भाई और एक बहन के साथ जिंदगी का सफर हंसी खुशी गुजर रहा था। पिता बीमार हुए तो घर की माली हालत गिरती चली गई। खाने के भी लाले पड़ने लगे। हंसने खेलने की उम्र में काजल पढ़ाई छोड़कर नौकरी करने की सोचने लगी। उसके पापा भी बेटी को उड़ता देखना चाहते थे। तमाम कठिनाइयों के बाद भी उन्होंने बेटी को स्कूल भेजना जारी रखा। हालात की मारी वह नौकरी की तलाश में घर से निकली तो उसे मेरठ में कोठे पर पहुंचा दिया गया। यहां से किसी तरह निकल तो गई, लेकिन अब वह कोठे से अपनी बच्ची को पाने की जद्दोजहद कर रही है।

जब घर की माली हालत ज्यादा खराब हो गई तो वह नौकरी करने करने के लिए घर से निकल गई। उसका संपर्क स्कूल के पास ही एक युवक से हुआ। वह नौकरी लगवाने के नाम पर उसे कोलकाता के बड़ा बाजार ले गया। वहां उसने एक युवक के साथ उसे भेज दिया और कहा कि नौकरी में अच्छे पैसे मिलेंगे। वह युवक उसे मेरठ ले आया और यहां कबाड़ी बाजार में राजू के कोठे पर बेच कर चला गया। धंधे में उतारने के लिए उसे तरह-तरह की यातनाएं दी गईं। मासूम को बांधकर रखा गया। खाना पीना भी बंद कर दिया।
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दूसरे धर्म का यह युवक भी भरोसे का नहीं निकला। मेरठ से उसे वह गुड़गांव ले गया और सड़क पर भटकता हुआ छोड़कर फरार हो गया। अनजान शहर में वह अपने बेटे के साथ सिर छिपाने की जगह की तलाश में भटक ही रही थी कि उसके लिए साफ्टवेयर इंजीनियर अरविंद फरिश्ता बनकर आया। अरविंद ने उसकी मजबूरी समझते हुए उसकी मदद की। काजल ने अपनी जिंदगी के पन्ने अरविंद के सामने खोल दिये, लेकिन अपनी बेटी होने की बात काजल अरविंद से छिपा गयी। देवता सरीखे अरविंद ने सबकुछ जानने के बाद भी काजल को अपना लिया। दोनों की शादी हो गयी। धीरे-धीर आठ साल बीत गए। इन आठ सालों में वह अपने सारे दुखों को भुला चुकी थी। याद थी सिर्फ अपनी बेटी। बेटी की याद में काजल के आंसू कभी भी छलक आते थे। कुछ दिन पूर्व काजल ने बेटी होने की बात भी अरविंद से कह डाली। अरविंद पर मानो कहर टूट पड़ा। इसलिए नहीं कि उसने बेटी की बात उससे छिपाई, वो इसलिए क्योंकि उसकी बेटी कोठे पर पल रही थी। वह भी बेटी से मिलने के लिए तड़प उठा। काजल को साथ लेकर बेटी को लेने के लिए मेरठ आ पहुंचा। अरविंद का पूरा प्रयास है कि बेटी का आठवां जन्मदिन उसके घर में मने। उसने अपनी बेटी को पाने के लिए डीएम समीर वर्मा और एसएसपी मंजिल सैनी से गुहार लगाई है। दोनों अधिकारियों ने उसकी बेटी से मिलाने के लिए प्रयास शुरू कर दिया।

दो बच्चों को जन्म दिया 
कोठे पर जुल्मों से तंग काजल ने वहां से कई बार भागने का प्रयास किया, हर बार पकड़ी गई और हर बार यातनाएं बढ़ती गईं। खेलने कूदने की 14 साल की उम्र में ही 2007 में उसने एक बेटे को जन्म दिया। फिर 2009 में एक बेटी को भी जन्म दिया।  

जब उम्मीद भी हो गई नाउम्मीद  
कोठे पर काजल की नजदीकियां कोठे पर आने वाले दूसरे धर्म के एक युवक से हो गई। उसने काजल को गलत धंधे से निकालकर माता पिता से मिलाने का भरोसा दिलाया। युवक ने कई बार काजल को भगा ले जाने का प्रयास भी किया, लेकिन कोठे के पहरेदारों की आंखों में धूल झोंकना आसान नहीं था। 11 नवबंर 2009 में 16 साल की उम्र में काजल ने एक और बच्ची को जन्म दिया। अंतत: 16 नवंबर 2009 को पांच दिन की बच्ची को कोठे पर छोड़कर दो साल के बेटे को लेकर युवक के साथ फरार होने में कामयाब हो गई।

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