ये महिला थाने में आने वाले दंपती के विवाद की लगभग हर केस की कहानी है। हर केस में पति-पत्नी एक दूसरे पर इसी तरह के आरोप लगाते हैं। जबकि एक दौर था, जब पति-पत्नी के बीच तकरार को रिश्तों की मिठास माना जाता था। लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश में अब यही तकरार तिल का ताड़ बन जाती है और बात तलाक और मुकदमे तक पहुंच जाती है।
दंपती के विवाद में परिवार पर भी आरोप लगते हैं और कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यही कारण है कि दांपत्य जीवन में तनाव और अलगाव की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। इनमें सबसे अधिक मामलों में मोबाइल, शराब, जुआ, परिजन, विवाहेत्तर संबंध को लेकर विवाद से शुरू हुए हैं।
रिश्ते बनाने में लगते हैं डेढ़ से दो महीने
शिकायती पत्र आने के एक या दो दिन बाद जब दोनों में गुस्सा कम होता है, तब वह दोनों को बुलाती हैं। उनके बीच हुए विवाद की वजह जानती हैं। फिर उनको 15 दिन का समय देती हैं। इसके बाद काउंसलिंग कर समझाने का प्रयास किया जाता है। उनको एक महीने का समय दिया जाता है।
तीसरी बार थाना पहुंचने वाले दंपती के बीच रिश्तों में काफी सुधार आ चुका होता है। महिला थाना प्रभारी दोनों के बीच उत्पन्न हुई गलतफहमी दूर कर उन्हें साथ रहने के लिए घर भेज देती हैं। महिला थाना प्रभारी ने बताया कि कुछ मामले ऐसे भी होते हैं। इनमें 5 से 6 बार काउंसलिंग की जाती है।
संवादहीनता भी अलगाव की वजह
महिला थाना प्रभारी सीता सिंह ने बताया दंपती में जरा सी बात पर विवाद सामने आ रहे हैं। पति-पत्नी आपस में बैठकर विवाद को सुलझाने का प्रयास नहीं करते हैं। एक-दूसरे के प्रति इतनी नाराजगी होती है कि बात को मन में रखकर उसे बड़ी बना लेते हैं। फिर इनके विवाद थाने तक पहुंच जाते हैं।
पत्नियों की शिकायत
-फोन पर न जाने किस-किस से बात करते हैं।
-परिवार वालों की सुनते हैं, मेरी हर बात टाल देते हैं।
-मायके के नाम पर ताना देते हैं।
-बहन के लिए नियम अलग व पत्नी के लिए अलग है।
-शराब और जुआखोरी से परिवार में आर्थिक तंगी
पतियों के आरोप
-घर में घुसते ही मांगों का अंबार लगा देती हैं।
-माता-पिता से अलग रहने का दबाव बनाती हैं।
-फोन हाथ में पड़ते ही सभी नंबर संदेह के घेरे में आ जाते हैं।
-छोटी-छोटी बात पर मायके जाने की धमकी देना।
आंकड़ों पर एक नजर
-महिला थाने में प्रतिदिन आती हैं 20 से 25 शिकायतें
-डेढ़ साल मेें 1165 से अधिक मामलों में काउंसिलिंग कर कराया गया है समझौता
-डेढ़ साल में 508 मामलों में समझौता नहीं होने पर दर्ज कराने पड़े मुकदमे।
-तीन महीने में 500 से अधिक शिकायतें हुईं दर्ज