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धरती निगल गई या आसमान, मेरठ से गायब हुए हरियाली देने वाले माइनर, कॉलोनी काटीं, तो कहीं बने मकान 

Tue, 07 Jan 2020 05:50 PM IST
Dimple Sirohi राजकुमार सैनी, अमर उजाला, मेरठ

सार

  • मलियाना से मोहकमपुर, मेवला से नूरनगर तक माइनर में कभी बहता था पानी। 
  • पूरे क्षेत्र के खेतों की इसी माइनर से होती थी सिंचाई।
  • 25 साल के भीतर माइनर पर हो गया कब्जा, अस्तित्व खत्म।
  • सिंचाई विभाग जागा तो काफी मकान, सड़क और नालों पर चलेगा बुलडोजर। 
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water minor in meerut - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मेरठ में मलियाना से नूरनगर तक फसलों को हरियाली देने वाले माइनर अब मौके से गायब हैं। पता नहीं कि इन्हें धरती निगल गयी या आसमान। करीब 20 साल से कहीं पर भी माइनर का नामोनिशान नहीं दिखाई दे रहा है। अरबों रुपये की जमीन पर अवैध कब्जे हो गए हैं।
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कहीं लोगों ने मकान बना लिए तो बिल्डरों ने कॉलोनी काट दीं। लेकिन सिंचाई विभाग की नींद नहीं टूटी। अधिकारियों का आना-जाना लगा रहा और किसी ने भी सरकारी जमीन को तलाशने का काम नहीं किया। जिसके कारण पूर्व के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लग रहे हैं। माना जा रहा है कि अगर जमीन पर कब्जे को लेकर विधिवत कार्रवाई होती है तो यहां बने मकान, सड़क व नालों पर बुलडोजर चलेगा। 
 

मलियाना राजवाहा से निकला था माइनर 
एमआईईटी कालेज के निकट बाईपास से होते हुए राजवाहा निकल रहा है। जो संजय वन के बराबर से बिजली बंबा बाईपास से गुजर रहा है। कागजों में इसकी चौड़ाई 22 से 27 मीटर है। मलियाना में इसी रजवाहा से नूरनगर के लिए लगभग 12 फीट चौड़ा माइनर निकाला गया था।

इसकी लंबाई लगभग साढ़े चार किमी थी। जिससे मलियाना, मोहकमपुर, हाफिजाबाद मेवला, सरस्वती लोक मार्ग से नूरनगर तक खेतों की सिंचाई होती थी। जानकार बताते हैं कि फतेहउल्लापुर तालाब तक माइनर का पानी पहुंचता था।

यह माइनर फसलों के लिए वरदान साबित होता था। लेकिन अब यह माइनर कहां है, उस पर किसने कब्जा कर लिया, अरबों रुपये की जमीन को कौन बेचकर खा गया, जैसे ज्वलंत सवालों के जवाब सिंचाई विभाग के पास नहीं हैं। 

कब्जा तो किया, जमीन ट्रांसफर नहीं
अगर कोई विभाग किसी दूसरे विभाग की भूमि पर अपनी योजना संचालित करता है तो उसको संबंधित विभाग यानी भूमि स्वामित्व विभाग से एनओसी लेनी होती है। साथ ही या तो उस भूमि की एवज में दूसरे स्थान पर जमीन देनी होती है या फिर उस जमीन की कीमत।

यह प्रक्रिया भी स्थानीय स्तर पर नहीं की जा सकती है। इसके लिए भूमि के स्वामित्व वाले विभाग और उस भूमि पर अपनी कोई योजना संचालित करने वाले विभाग को भूमि हस्तांतरित करने के लिए शासन स्तर से स्वीकृति दी जाती है। लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ और जमीन पर कब्जे कर लिए गए।
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सरकारी प्रक्रिया भी दरकिनार
माइनर की भूमि पर कब्जा करने वाले किसी सरकारी अथवा प्राइवेट व्यक्ति ने सिंचाई विभाग से न तो हस्तांतरित करने के  लिए कोई पत्र व्यवहार किया और न ही विभाग के खजाने में भूमि की कीमत जमा की। इतना ही नहीं सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने भी अरबों रुपये की बेशकीमती जमीन को मिलीभगत करके लुटने दिया।

अलमारियों में कैद हैं रजवाहा और माइनरों की फाइलें   
शहर का विस्तार होता गया। खेत कंकरीट के जंगलों में तब्दील होते गए। इस प्रक्रिया में सिंचाई विभाग के रजवाहे और माइनर भी लुप्त होते गए। सभी की फाइलें विभाग की अलमारी में कैद कर दी गयी।

यही नहीं, जानकारी मिल रही हैं कि सिंचाई विभाग की जमीन पर अवैध कब्जे कराने वालों में शामिल रहने वाले विभाग के अधिकारियों ने रिकॉर्ड में भी फेरबदल किया है। बताया जा रहा है कि अगर विभाग ने गंभीरता से जांच की तो जहां तत्कालीन अधिकारियों पर भी गाज गिरेगी, वहीं अवैध कब्जा कर किए गए निर्माणों पर भी बुलडोजर चलेगा।
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