देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकसभा, विधानसभा और नगर निगम चुनाव भले ही ईवीएम से होने लगे हों, लेकिन मतगणना के एजेंट आज भी पुराने ढर्रे पर ही काम करते हैं। उनके लिए मतगणना कक्ष में सिर्फ कैलकुलेटर ले जाने की अनुमति है। ये एजेंट अभी भी बैलेट पेपर की मतगणना के जमाने की तरह मतगणना का डाटा तैयार करते हैं।
पहले बैलेट पेपर से चुनाव होते थे। एक राउंड की मतगणना के बाद मतगणना एजेंट अपने पास मौजूद चक्रवार गणना के पेपर पर प्रत्येक प्रत्याशी को प्राप्त मतों को दर्ज करते थे। यह प्रपत्र तुरंत मुख्य एजेंट के पास जाता था और वह बड़े प्रपत्र पर जिस पर टेबिलवार गणना की टेबिल बनी होती थी, उस पर प्राप्त मतों के आंकड़े प्रत्याशीवार दर्ज करते थे। इसके बाद दूसरे प्रपत्र पर इस टेबिलवार गणना के जोड़ को चक्रवार दर्ज करते थे। इसके बाद अंतिम चक्र पूरा होते ही उसकी गणना करते थे। लोकसभा चुनाव में विधानसभावार गणना को मिलाकर उसका अंतिम जोड़ तैयार कर अपना अनुमानित आकलन निकाल लेते थे। यदि कहीं मतगणना के आंकड़ों में अंतर नजर आता था, तो उसकी शिकायत दर्ज कराकर जांच कराने या दोबारा गणना की मांग करते थे।
अब चुनाव ईवीएम से होने लगा है। मतगणना भी इलेक्ट्रॉनिक तरीके से होती है, जिसमें बहुत कम समय लगता है। लेकिन प्रत्याशियों के एजेंट आज भी उसी पुराने ढर्रे पर प्रत्येक टेबिल की गणना प्रपत्र पर दर्ज करते हैं और मुख्य मतगणना एजेंट उसे आरओ (रिटर्निंग ऑफिसर) टेबिल के पास या मतगणना कक्ष के किसी कोने में बैठकर उसका जोड़ लगाकर दोनोें प्रपत्र तैयार करता है। मतगणना में प्रत्याशियों के एजेंट अब तक हाईटेक नहीं हो पाए हैं।
लैपटॉप की अनुमति हो तो तेजी से हो काम
भाजपा के चुनाव प्रबंधन टीम के प्रशासनिक विभाग के प्रभारी विवेक रस्तोगी का कहना है कि निर्वाचन विभाग की तरफ से एजेंट को मतगणना कक्ष में मोबाइल ले जाने पर प्रतिबंध है। ऐसे में वहां पर इंटरनेट भी नहीं चल सकता है। बिना इंटरनेट चलाए यदि एजेंट को टैब और लैपटॉप ले जाने की अनुमति मिल जाये तो काम तेजी से और सुगमता से हो सकता है। क्योंकि सॉफ्टवेयर की मदद से प्राप्त मतों का जोड़ अपने आप लगता जाएगा, उसके लिए कैलकुलेटर का अलग से उपयोग नहीं करना पड़ेगा।