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Meerut News: जन्म, जाति और निवास के प्रमाणपत्रों में उलझे मतदाता

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वोट बचाने के लिए दर-दर भटक रहा मतदाता
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रविंद्र चौहान



हस्तिनापुर। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) ने हजारों मतदाताओं के सामने मताधिकार बचाने का संकट खड़ा कर दिया है। मतदाता सूची से नाम कटने और कारण बताओ नोटिस मिलने के बाद आम लोग अपने मताधिकार को बचाने के लिए जन्म, जाति और निवास के दस्तावेजों के भंवर में फंस गए हैं। हालात यह हैं कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा अधिकार साबित करने के लिए मतदाता कलक्ट्रेट, तहसील और ब्लॉक कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।



हस्तिनापुर विधानसभा क्षेत्र में करीब 3.52 लाख मतदाता पंजीकृत हैं। एसआईआर के बाद लगभग 64 हजार मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए थे, जबकि 25 हजार मतदाताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। नोटिस पाने वाले मतदाताओं को 24 फरवरी तक सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के समक्ष दस्तावेज प्रस्तुत कर अपना मताधिकार साबित करना है। समय सीमा नजदीक है लेकिन व्यवस्था बेपटरी नजर आ रही है।
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निर्वाचन आयोग की गाइडलाइन के अनुसार सत्यापन के लिए जन्म, निवास, जाति प्रमाणपत्र अथवा 13 वैकल्पिक दस्तावेजों में से किसी एक की अनिवार्यता तय की गई है। जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों के बड़ी संख्या में मतदाताओं के पास इनमें से कोई भी पुख्ता दस्तावेज नहीं है। दस्तावेज बनवाने पहुंचे लोगों की ब्लॉक और तहसील कार्यालयों में लंबी कतारें लग रही हैं लेकिन काम की रफ्तार बेहद धीमी है।



सबसे ज्यादा आक्रोश स्थायी निवास प्रमाणपत्र को लेकर है। आयोग ने मैपिंग के लिए स्थायी निवास प्रमाणपत्र को मान्य किया है, जबकि यह नोटिस धारक मतदाताओं के पास नहीं है। यहां सामान्य निवास प्रमाणपत्र बनाया जाता है जिसे कई मामलों में अस्वीकार किया जा रहा है। इस विरोधाभास के चलते मतदाता असमंजस में हैं। मतदाता वैकल्पिक रूप से जाति प्रमाणपत्र बनवा रहे हैं, लेकिन उसकी प्रक्रिया जटिल होने से लोगों की परेशानी और बढ़ गई है। परिवार रजिस्टर की नकल और जन्म प्रमाणपत्र के लिए भी मतदाता पिछले दस दिनों से कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं।



नहीं मिल रही वर्ष 2003 की मतदाता सूची



वर्ष 2003 की मतदाता सूची से अनिवार्य मैपिंग की शर्त ने स्थिति को और विस्फोटक बना दिया है। तहसील और ब्लॉक कार्यालयों में आवेदनों का ढेर लगा है लेकिन सुनवाई और निस्तारण की रफ्तार बेहद धीमी है। मतदाता सवाल उठा रहे हैं कि जब सरकारी दस्तावेज ही समय पर उपलब्ध नहीं कराए जा रहे तो आम नागरिक अपने मताधिकार को आखिर कैसे बचाए।
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ये दस्तावेज जरूरी



केंद्र व राज्य सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में नियमित कर्मचारी, पेंशनभोगी को जारी कोई भी पहचान पत्र या पेंशन भुगतान आदेश। एक जुलाई 1987 से पहले सरकार, स्थानीय प्राधिकरण, बैंकों, डाकघर, एलआईसी, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से जारी कोई भी पहचानपत्र, प्रमाणपत्र या दस्तावेज। भारतीय पासपोर्ट, मान्यता प्राप्त बोर्ड, विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक प्रमाणपत्र, सक्षम राज्य प्राधिकारी से जारी स्थायी निवास प्रमाणपत्र, वन अधिकार प्रमाणपत्र, सक्षम प्राधिकारी से जारी ओबीसी, एससी, एसटी या कोई भी जाति प्रमाणपत्र, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की नकल, राज्य, स्थानीय प्राधिकारियों से तैयार किया गया परिवार रजिस्टर, सरकार से जारी कोई भी भूमि, मकान आवंटन प्रमाणपत्र।
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