उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में ग्रामीणों को पीने के लिए शुद्ध जल उपलब्ध कराने को 24 गांवों में चल रही 91.13 करोड़ की योजनाएं आठ साल से अधर में लटकी है। जल निगम के अधिकारी योजनाओं पर खर्च तो बढ़ाते जा रहे हैं, लेकिन योजनाओं को पूरा करने पर कोई ध्यान नहीं है। राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल योजना में नए गांव तो शामिल हो रहे हैं और बजट भी आ रहा है, लेकिन पुरानी योजनाओं को पूर्ण करने को लेकर विभाग ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
प्रदूषण नियंत्रण विभाग की जांच में कई गांवों के पानी को जहरीला पाया गया था। इस पानी को पीने योग्य नहीं मानकर ऐसे सभी गांवों में राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल योजना में पानी की टंकी लगाने को मंजूरी मिली थी। वर्ष 2012 में योजना स्वीकृत हुई और टेंडर छोड़ दिए गए। विभाग के अफसरों के कारण नतीजा यह हुआ कि जिन परियोजनाओं को दो साल में पूरा हो जाना चाहिए था, ये आठ साल में भी पूरी नहीं हो पाई। जिन गांवों में योजना अधूरी पड़ी हैं, इनमें बुढ़ाना तहसील का रियावली नंगला, कसेरवा, रसूलपुर जाटान, बसधाडा सदर तहसील का बसेड़ा, पीनना, नूनाखेडा, बलवाखेडी, कुल्हेडी शामिल हैं। खतौली तहसील का हुसैनपुर बोपाडा, मंसूरपुर, चंदसीना और जानसठ तहसील का मोरना, भोपा, संभलहेडा, महलकी, जौली, तिसंग हैं। नागर इकाई के अंतर्गत जसोई, सरवट, खुड्डा, सांझक, दधेडूखुर्द, खाईखेडी में टंकी बनाई जा रही है। इन 24 परियोजनाओं की लागत 91 करोड़ 13 लाख है। केवल चार योजनाओं में ही 90 प्रतिशत काम पूरा बताया जा रहा है। बड़ी बात यह है कि टंकी से ग्रामीणों को एक बूंद भी पानी की नसीब नहीं हो रही है।
एक्सईएन को पता ही नहीं, योजना अधूरी भी
जल निगम के अधिशासी अभियंता पीके अग्रवाल को यह मालूम हीं नही है कि 24 गांवों में परियोजना अधूरी पड़ी है। जब गांवों के नाम बताए गए तो बोले, जून माह तक सभी गांवों में काम पूरा करा देंगे। उन्होंने दावा किया कि पैसे की कमी नहीं है, जल्द ही काम पूरे कराएंगे।