चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय कैंपस के इतिहास विभाग में बाबा बंदा सिंह बहादुर के 302वें शहादत दिवस पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वानों ने विचार रखे।
संगोष्ठी का विषय बाबा बंदा सिंह बहादुर इतिहास एवं लोक स्मृति रहा। इतिहास विभागाध्यक्ष और संयोजिका प्रो. अजय विजय कौर ने कहा कि अमर शहीद बाबा बंदा सिंह बहादुर एक वीर सेनानायक थे। उन्होंने मुगलों से स्वतंत्रता के लिए लोहा लिया। बंदा, गुरु गोविंद सिंह के नाम से सिक्के और मोहरे जारी किए। बंदा सिंह बहादुर ने सामाजिक समरसता की मिसाल कायम करते हुए निम्न वर्ग को अधिकार दिए। उनकी सेना में पांच हजार मुस्लिम सैनिक थे। छप्पर चीरी के युद्ध में बंदा सिंह बहादुर ने प्रति शौर्य का परिचय देते हुए दुश्मनों को विस्मित कर दिया। इसी युद्ध में बंदी बनाए जाने के बाद उन्हें व उनके पुत्र को निर्मम यातनाएं दी गई, जिससे वह और उनके पुत्र शहीद हो गए। प्रो. विघ्नेश त्यागी ने बताया कि प्रो. गंदा सिंह जी ने बंदा सिंह के व्यक्तित्व को अधिक मनमोहक बताया था। फ्रंास की क्रांति से पूर्व बंदा सिंह जी स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के पक्षधर थे। प्रो. सतीश चंद्र मित्तल ने गुरु और बंदा सिंह की शहादत का पूर्ण विवरण प्रस्तुत किया। प्रो. जी खुराना ने बताया कि बंदा जी का आंदोलन एक धर्मयुद्ध था, लेकिन धार्मिकता का नहीं केवल अधिकारों का। प्रो. गीता श्रीवास्तव ने बताया कि बंदा सिंह बहादुर पर अधिक शोध कार्य केवल पंजाब में ही हुआ है। ऐसे में इन पर शोध कार्य करने की आवश्यकता है। बंदा ने जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया। मुगल साम्राज्य के पतन के लिए बाबा बंदा सिंह बहादुर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कुलपति प्रो. एनके तनेजा कहा कि इस समय आवश्यकता इस बात की है कि बाबा बंदा सिंह बहादुर को विषय पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। नौ जून को ऐतिहासिक दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। प्रो. आराधना ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। डॉ. शुचि गुप्ता, डॉ. कौशिकी दास गुप्ता, डॉ. मुकेश पाल, डॉ. पवन कुमार, डॉ. विनोद, कमल कांत, लोकेश कुमार, कालूराम, विकास कुमार, डोली, अमिता, योग्यता शर्मा, खुशबू रानी, अविनाश, अमित कुमार और छात्र-छात्राओं का सहयोग रहा।