पति की लंबी आयु के लिए है वट सावित्री व्रत
मेरठ। हिंदू पंचांग के अनुसार वैसे तो हर महीने अमावस्या आती है। यह पुण्य के लिए जानी जाती है। इस दिन पितरों की शांति के लिए लोग पिंडदान एवं तर्पण आदि करते हैं। धर्मग्रंथों में ज्येष्ठ माह की अमावस्या का महत्व सबसे अधिक बताया है। इंडियन काउंसिल ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल के संयुक्त सचिव आचार्य कौशल वत्स ने बताया कि ज्येष्ठ अमावस्या के दिन एक शनि जयंती एवं वट सावित्री व्रत आदि पड़ते हैं। इस बार 22 मई को ज्येष्ठ अमावस्या है।
ज्येष्ठ अमावस्या तिथि का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमावस्या पर गंगा स्नान करना चाहिए। इस बार लॅाकडाउन की वजह से गंगा स्नान संभव नहीं है, इसलिए घर में सभी पवित्र तीर्थों का ध्यान करते हुए स्नान करें। यदि घर में गंगा जल है तो इस दिन स्नान करने वाले जल में थोड़ा सा गंगा जल मिला लें। इस दिन अपनी क्षमता के अनुसार दान अवश्य करें। साथ ही आज के दिन अपने मन में पितरों की तृप्ति का संकल्प कर जल, अन्न, फल, कच्चा दूध का दान करना चाहिए। ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
शनि देव का भी यही विशेष दिन
ज्येष्ठ अमावस्या को सूर्यदेव और देवी छाया के पुत्र भगवान शनि के अवतरण दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। इस उत्सव को शनि जयंती भी कहा जाता है। इस कारण से ज्येष्ठ अमावस्या का महत्व और भी बढ़ जाता है। सूर्य पुत्र शनि देव हिंदू ज्योतिष में नवग्रहों में से हैं। मंदगति से चलने की वजह से इन्हें शनैश्चर भी कहा जाता है। इस दिन दशरथ कृत शनि स्तोत्र का 11 बार पाठ करना उत्तम रहेगा।
इस तरह करें पूजन
मंदिर न जा पाने की स्थिति में घर पर ही सरसों के तेल का दीपक जलाकर उसमें काले तिल डालें। दो दीपक घर के बाहर, दो दीपक छत पर तथा एक जलाशय पर रखकर शनिदेव को घर से ही प्रसन्न करें। शनि अमावस्या के दिन काले उड़द, काले जूते, काले वस्त्र, तेल का दान एवं शनि महाराज की पूजा बहुत शुभ फलदायी होती है। इससे शनि महाराज अपनी महादशा, अंतर्दशा और गोचर के दौरान अधिक नहीं सताते हैं और परेशानियों का सामना करने की क्षमता भी देते हैं। इस दिन सुरमा, काले तिल, सौंफ आदि वस्तुओं से मिले जल से स्नान करने से ग्रह दशा दूर होती है।
अमावस्या के दिन रखा जाता है वट सावित्री व्रत
अमावस्या के दिन अन्य पुण्य कार्यों के साथ इस दिन महिलाएं वट-सावित्री का व्रत भी करती हैं। वट सावित्री का व्रत देवी सावित्री द्वारा अपने पति सत्यवान के प्राणों की यमराज से रक्षा करने के लिए किया गया था। सावित्री से प्रसन्न होकर यमराज ने चने के रूप में सत्यवान के प्राण सौंपे थे। तभी से इस व्रत को विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु एवं सुखी जीवन के लिए रखती हैं। इस दिन पीपल व वट वृक्ष की परिक्रमा पूजन कर सुहागिनों का व्रत पूर्ण होता है।