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ये है सहारनपुर बवाल के पीछे की सियासत, दलितों में ऐसा आक्रोश कभी नहीं देखा, कई बसों में लगाई आग

Wed, 10 May 2017 04:39 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ सहारनपुर
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सहारनपुर में बस में लगाई आग
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सियासत को लहू पीने की लत है, नहीं तो मुल्क में सब खैरियत है। मुनव्वर राणा का यह शेर सहारनपुर में उपजे बवाल पर बेहद सटीक बैठता है। बसपा का गढ़ और दलित बहुल सहारनपुर में फैल रही आक्रोश की ज्वाला अत्याचार की सियासत से भड़क रही है। सियासत दलित वोट बैंक को अपने पाले में करने के लिए अब छोटी-छोटी घटनाओं को तूल देकर न्याय के प्रतिकार के मुद्दे को हवा दे रहे हैं। इसी का नतीजा है कि दलितों के मन में यह बात घाव करने लगी है कि प्रशासन और पुलिस तटस्थ या पक्षपातपूर्ण हैं। यही कारण है कि इतना जल्दी दलित समाज लामबंद होकर हाथों में तलवार और तमंचा लेकर सड़कों पर उतर आया। इस पूरी घटना से एक बात साफ है कि अत्याचार की हवा बनाकर आक्रोश की ज्वाला भड़काई जा रही है। अगर इस हालात पर काबू नहीं किया गया तो सहारनपुर ही नहीं समूचे पश्चिमी यूपी दंगे से भी खराब हालात हो जाएंगे।
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सहारनपुर में बवाल, पुलिस पर किया पथराव
बसपा के सबसे मजबूत किले में हमेशा हाथी की चिंघाड़ता था। मगर, पहले लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव में भाजपा की लहर में इसके महावत खुद नीचे उतर गए हैं। इसके बाद सड़क दूधली से लेकर शब्बीरपुर कांड में दलितों को निशाना बनाया गया तो समाज के लोगों में असुरक्षा की भावना आने लगी। सियासत का दौर भी यहीं से शुरू हुआ है। दलितों को अपने पाले में करने के लिए सियासी लोग उन घटनाओं को तूल देने के साथ ही उन्हें अत्याचार तक का अहसास कराने में जुट गए। इतना ही नहीं, पुलिस प्रशासन की कार्रवाइयों से भी उनका विश्वास हटाने की पुरजोर कोशिशें की गई हैं। यही कारण है कि लोकसभा और विधानसभा चुुनाव में खुद को हिंदुत्व के पाले में खड़ा करने वाला दलित एक झटके में अलग-थलग सा महसूस करने लगा। 

सड़क दूधली कांड में नहीं भड़के थे दलित

सहारनपुर में बवाल
सड़क दूधली में बिना अनुमति अंबेडकर जयंती की शोभायात्रा निकालने पर दलित-मुस्लिम संघर्ष हुआ। उस वक्त दलितों ने आक्रोश जरूर दिखाया, मगर, सड़कों पर नहीं उतरे। हालांकि उस वक्त इस मुद्दे को भाजपा भुनाना चाहती थी। दूसरे दल इस मुद्दे पर तटस्थ ही रहे थे। शब्बीरपुर की घटना के बाद भाजपा भले ही बैकफुट पर रही, मगर दूसरे दल दलितों के समर्थन में उतरने से गुरेज नहीं किया। ऐसे में अब तक पनप रहे आक्रोश पर सियासी हवा से इनकार नहीं किया जा सकता।
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नए समीकरणों पर है सबकी नजर

कई दर्जन गाड़ियां फूंकी
आने वाले निकाय और इसके बाद लोकसभा चुनाव के नए समीकरणों पर भी नजर है। भाजपा हमेशा दलितों को हिंदू बनाकर रखना चाहेगी। जबकि बसपा अपने बेस वोट दलित के साथ मुस्लिम और अन्य जातियों का गठजोड़ चाहेगी। कांग्रेस भी मुस्लिम के साथ दलितों को अपने पाले में करना चाहेगी। उधर, सपा दलित तो अलग कर अपने पाले को मजबूत करने की कोशिश करेगी। ऐसे में इन बवालों के जरिए सियासी सूरमा नए समीकरण पर नजरें गड़ाए हुए है।
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