मेरठ में 24 अप्रैल 1857 की सुबह थर्ड नेटिव लाइट कैवेलरी रेजीमेंट की परेड में कर्नल कारमाइकल स्मिथ ने चर्बी लगे कारतूस चलाने का आदेश दिया था। इन कारतूसों को बंदूक में डालने से पहले मुंह से खोलना पड़ता था। रेजीमेंट के 90 में से 85 सैनिकों ने मुंह से ये कारतूस खोलने से मना कर दिया। कारतूसों के खिलाफ बगावत कर दी। 9 मई 1857 को मेरठ के परेड ग्राउंड (वर्तमान में कुलवंत सिंह स्टेडियम) में इन सैनिकों को लाकर उनका कोर्ट मार्शल कर इनकी वर्दी उतारी गई। 10 मई 1857 को यही 85 सैनिक जंग-ए-क्रांति के प्रमुख सूत्रधार बने। इनके नाम हवलदार मातादीन, शेखपीर अली नायक, अमीर कुदरत अली नायक, शेख हुसैनद्दीन, शेख नूर मोहम्मद नायक, शीतल सिंह, जहांगीर खान, मीर मौसिन अली, अली नूर खां, मीर हुसैन बक्स, मथुरा सिंह, नारायण सिंह, लाल सिंह, शोदान सिंह, शेख हुसैना बक्स, साहिब दाद खान, बिशन सिंह, बलदेव सिंह, शेख नुन्दू, नवाब खां, शेख रमजान अली, मोहम्मद खान, मक्खन सिंह, दुर्गा सिंह प्रथम, नसर उल्लाह बेग, मेहराब खान, दुर्गा सिंह द्वितीय, नवी बक्ष खान, जुर खान सिंह प्रथम, नुदजू खान, जुर खान सिंह द्वितीय, अब्दुल्ला खान, इसेन खान प्रथम, जबरदस्त खान, मुर्तजा खान, मरजूर सिंह, अजीमुल्ला खान प्रथम, अजीमुल्ला खान द्वितीय, काला खान, शेख सादुल्ला, सालार बख्श खान, शेख रुत अली, द्वारका सिंह, कालका सिंह, रघुवीर सिंह, बलदेव सिंह, दर्शन सिंह, इंदाद हुसैन, पीर खान प्रथम, मोती सिंह, शेख फजल इमाम, हीरा सिंह, सेवा सिंह, मुराद शेर खान, शेख आराम अली, काशी सिंह, अशारफ अली खान, कादर दाद खान, शेख रुस्तम, भगवान सिंह, मीर इमदाद अली, शिव वक्ष सिंह, लक्ष्मण सिंह, शेख इमाम बक्ष, उस्मान खान, दरियाव सिंह, मसूद अली खान, शेख गयास बख्स, शेख उनमेद अली, अब्दुल वहाब खान, राम सहाय सिंह, पनहा अली खान, लक्ष्मण दुबे, राम सरन सिंह, शेख ख्वाजा अली, शिवसिंह, शीतल सिंह, मोहन सिंह, विलीयात अली खान, शेख मोहम्मद ख्वाज, इंद्र सिंह, फतह खान, मेकू सिंह, शेख कासम अली, रामचरण सिंह आदि हैं।
क्रांति का कौमी तराना
क्रांति दिवस पर शहीदों को नमन
क्रांति का कौमी तराना
हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा
पाक वतन है कौम का जन्नत से भी प्यारा।
ये है हमारी मिल्क़यत हिंदुस्तान हमारा
इसकी रुहानियत से रोशन है जग सारा।
कितना कदीम कितना नईम सब दुनिया से न्यारा
करती है जरखेज जिसे गंगो जमुन की धारा।
ऊपर बर्फीला पर्वत, पहरेदार हमारा
नीचे साहिल पर बजता सागर का नक्कारा।
इसकी खानें उगल रहीं सोना, हीरा, पारा
इसकी शानो शौकत का दुनिया में जयकारा।
आया फिरंगी दूर से ऐसा मंतर मारा
लूटा दोनों हाथों से प्यारा वतन हमारा।
आज शहीदों ने है तुमको अहले वतन ललकारा
तोड़ो गुलामी की जंजीरें, बरसाओ अंगारा।
हिंदू मुसलिम सिख, हमारा भाई-भाई प्यारा
यह है आजादी का झंडा इसे सलाम हमारा।
(यह गीत क्रांति के पूरे दौर में और उसके बाद भी गुनगुनाया जाता रहा। माना जाता है कि देश को आजादी दिलाने में यह गीत बहुत महत्वपूर्ण रहा। युवाओं में क्रांति अग्नि पैदा करने के लिए यह गीत गली-गली में गाया जाता था। अजीमुल्ला खां ने इस गीत की रचना की)
1857 की स्मरणीय तारीखें
ये थे अंग्रेजों के बंगले
1857 की स्मरणीय तारीखें
8 अप्रैलः मंगल पांडेय को फांसी दी गई।
9 मईः चर्बी युक्त कारतूस का विरोध करने पर 85 सैनिकों का कोर्ट मार्शल।
10 मईः 85 सैनिकों ने अंग्रेजी हुकुमत का विद्रोह किया
11 मईः सिपाहियों का दिल्ली में कब्जा।
13 से 31 मईः देश के विभिन्न जिलों में विद्रोह
1 से 5 जूनः मुरादाबाद, बदायूं, आजमगढ़, सीतापुर में विद्रोह शुरू
6 जूनः नाना साहब की फौज द्वारा कानपुर का घेराव
7 से 8 जूनः झांसी का किला फतह
9 से 13 जूनः फतेहपुर, दरिायाबाद और नौ गांव में विद्रोह
निशाने पर थे अंग्रेजों के बंगले
ये थे अंग्रेजों के बंगले
निशाने पर थे अंग्रेजों के बंगले
10 मई को जब हिंसा हुई तो क्रांतिकारियों के निशाने पर अंग्रेजों के बंगले रहे। तीन बंगलों का उल्लेख दस्तावेजों में मिलता है। सैनिकों को गाय और सूअर की चर्बी से बने कारतूस चलाने का आदेश देने वाला थर्ड कैवेलरी का कमांडिंग ऑफिसर कारमाइकल स्मिथ के वेस्ट एंड रोड स्थित बंगले को निशाना बनाया गया था। हालांकि कारमाइकल स्मिथ पहले ही फरार हो गया था। एक और बंगले में मिसेज चेंबर को क्रांतिकारियों ने मार डाला। अंग्रेजों के एक अधिकारी चार्ल्स कॉशन के बंगले को आग लगा दी थी।