सस्ती पड़ेंगी लोकल मूर्ति
देवी-देवताओं की मूर्तियों का बाजार हर हिंदू घर, प्रतिष्ठान में है। विदेश से आने वाली मूर्तियों की तुलना में जिले में बनने वाली लकड़ी की मूर्ति सस्ती पड़ेगी। ये मूर्तियां शीशम, बबूल व आम की लकड़ी से बनाई जाएंगी। ‘एक जिला एक उत्पाद’ में शामिल काष्ठकला उद्योग की जिले में करीब 800 इकाइयां हैं। इनका सालाना टर्नओवर करीब 300 करोड़ रुपये है। काष्ठकला में बनने वाला 80 प्रतिशत से अधिक माल विदेशों को निर्यात होता है। जिलेवासी विदेशों के आइटम बड़े पैमाने पर घरों में सजाते हैं और अपने जिले के काष्ठकला आइटमों के बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं।
बिना पैकिंग जाता है माल
जिले के काष्ठकला उद्योग की नक्काशी बेजोड़ है। भले ही इसका विदेशों में नाम है लेकिन यहां के कारीगर गुमनाम हैं। नगीना से जो माल निर्यात होता है उसकी पैकिंग तक नहीं होती है। निर्यातक उद्यमियों से बिना पैकिंग वाला माल ही खरीदते हैं और उस पर अपनी पैकिंग करके निर्यात करते हैं। काष्ठकला उद्यमी इरशाद मुल्तानी का कहना है कि काष्ठकला उद्योग देवी देवताओं की मूर्तियों के साथ- साथ फैंसी आइटम में विदेशी कंपनियों पर कहीं भारी है। इससे उद्यमियों को राहत मिलेगी तो वे भी अपने उत्पादों के दाम कम कर सकेंगे।
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