हस्तिनापुर। हस्तिनापुर में राजा रघुनाथ महल आजादी के आंदोलन का गवाह भी है।
राजा रघुनाथ नायक मराठे के इस महल में रहकर कई क्रांतिकारियों ने देश को आजाद कराने में मुख्य भुमिका निभाई। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी के मामा रघुनाथ नायक फौजी क्रांति के बाद यहां आकर छिपे थे। उन्होंने ही इस महल का निर्माण कराया था। महल में ऐसी दो गुफाएं हैं। जिसमें एक साथ 50 लोग बैठ सकते हैं। वर्ष 1919 में स्वतंत्रता सेनानी और महान संत सुमेर सिंह काली कमली वालों ने इस इमारत की कमान संभाली। इस गुरुकुल में देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी जाती थी। 1939 में काली कमली वालों के ब्रह्मलीन हो जाने के बाद शिष्य ब्रह्मचारी डॉ. स्वामी महंत उर्फ रामकिशन को महल का संचालक नियुक्त किया गया। संन्यासी जीवन व्यतीत करते हुए स्वामी जी आजादी की लड़ाई मे कूद पड़े। वह ब्रिटिश हुकूमत द्वारा गिरफ्तार कर लिये गये। उन्हें आन्ध्र प्रदेश की उस्मानाबाद जेल मे बंद कर दिया गया। इसी दौर में क्रांतिकारी और प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री भी तीन माह स्वामी जी के साथ रहे। स्वामी जी हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू एवं पंजाबी समेत सात भाषाओं का ज्ञान रखते थे। वेदों के प्रचार हेतु उन्होंने देशभर में हिन्दुत्व की पताका लहराई।
वर्ष 1942 के आंदोलन के दौरान यहां युवाओं में देशप्रेम का जज्बा भरा जाता था। भारत छोड़ो आंदोलन में यह महल काफी चर्चा में रहा। उस समय कई बार यहां क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए छापे भी मारे गये। हालांकि सिपाही रहस्यमय गुफा तक नहीं पहुुंच पाये। मौजूदा महंत ब्रह्मचारी भीष्म रमन स्वामी के अनुसार स्वतंत्रता के समर में इस इमारत की गुफा देशभक्त सालिगराम, अलगूराय शास्त्री, सम्पूर्णानंद शास्त्री, चंद्रशेखर आजाद शिव वर्मा समेत कई क्रांतिकारी यहां आ चुके हैं। बताया जाता है कि 1857 में वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के समय फौजी विद्रोह के बाद राजा रघुनाथ नायक मराठे ने अपने साथियों के साथ छिपने के लिए इसी स्थान का उपयोग किया था। उन्होंने यहां लंबा समय बिताया। पांडव ब्लॉक के आरक्षित जंगल के बीच और पांडव टीला उल्टाखेड़ा के समीप जमीन से लगभग 40 फिट ऊंचे टीले पर स्थित रघुनाथ महल के दक्षिण में 1857 के समर में राजा रघुनाथ महल मराठे द्वारा मां दुर्गा का मंदिर की स्थापना की गई थी। जिसे किसी मुगल शासक ने ध्वस्त कर दिया था। इसके अवशेष आज भी मौके पर बिखरे पड़े हैं। इसके परकोटे, गुफा पर बने गुंदब सभी कुछ क्रांतिवीरों की याद दिलाते हैं। बताया जाता है कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बीजारोपण भी इसी महल से हुआ था। सन 1901 में महात्मा शाहदास ने धर्मप्रचार व देश भक्ति की अटूट प्रेरणा दी थी। प्रथम गुरु के रूप में वे 1918 को मोक्ष को प्राप्त हुए। इसके बाद 1919 में महात्मा सुमेर सिंह काली कमली वाले जो पनियाला के राजा थे। उन्होंने यहां गुरुकुल की स्थापना की। महात्मा जी को देश स्वतंत्रता की बड़ी धुन थी। इसी वर्ष उन्होंने साइमन कमीशन को काले झंडे दिखाए थे। जिस पर उन्हें जेल में डाल दिया गया था। जेल में उन्होंने 60 दिन का अनश्न किया। उसके बाद इस महल के संचालक महात्मा जी के शिष्य रामकिशन उर्फ डॉ. स्वामी महंत बने। उन्होंने गुरु परंपरा को जारी रखते हुए आर्य समाज व समाज सुधार के प्रचार प्रसार में तन, मन, धन से आंदोलन में जुड़ गये। संन्यासी का जीवन व्यतीत करते हुए स्वामी जी आजादी का बिगुल बजाते रहे। वर्ष 2001 में वे परलोक सिधार गये। उनके शिष्य ब्रह्मचारी महंत भीष्म रमन स्वामी इस महल की देखरेख व संचालन करते हैं।