विधानसभा चुनाव का पहला चरण वेस्ट यूपी में होने के कारण अधिकांश दलों के दिग्गज क्रांतिधरा और आसपास के इलाकों में दहाड़ने को तैयार हैं। इसके पीछे हर दल की अपनी रणनीति है तो उनके फार्मूलों की परख भी यहीं से होनी है। यह भी तय है कि पहले चरण के चुनाव के बाद पश्चिम से चली हवा का असर पूरब तक होगा। हर दल की कोशिश होगी कि वह हवा का रुख अपने पक्ष में कर ले।
दरअसल, लोकसभा चुनाव से पहले मेरठ में नरेंद्र मोदी की रैली हुई थी। केंद्र सरकार के दो साल पूरे होने पर भी वेस्ट यूपी के ही सहारनपुर में प्रधानमंत्री ने बड़ी रैली की थी। सभी दल वेस्ट यूपी से बेहतर संदेश देकर ही प्रदेश के दूसरे हिस्सों के चुनावी रण में जाना चाहते हैं। सभी दलों के समीकरणों के हिसाब से भी पश्चिम की भूमि फायदेमंद साबित हो सकती है।
सीएम अखिलेश दो फरवरी को बड़ौत में रैली करेंगे
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव
प्रधानमंत्री मोदी यूपी में चुनावी रैलियों का आगाज मेरठ से करेंगे। वह चार फरवरी को यहां रैली करेंगे। इससे पहले सीएम अखिलेश यादव दो फरवरी को बड़ौत और बुढ़ाना में रैली करेंगे तो बसपा प्रमुख मायावती एक फरवरी को ही मेरठ से पश्चिम में चुनावी शंखनाद करेंगी।
केजरीवाल भी आए थे मेरठ
क्रांतिधरा और उसके आसपास की भूमि का सियासी लाभ उठाने के लिए ही अरविंद केजरीवाल नोटबंदी पर केंद्र सरकार को घेरने मेरठ आए थे। बेशक आम आदमी पार्टी (आप) यहां से चुनाव नहीं लड़ रही है, लेकिन दिल्ली में मेरठ के असर और भविष्य की सियासत के हिसाब से भी केजरीवाल ने क्रांतिधरा का रुख किया था।
नरेंद्र मोदी का आना ही अहम
लोकसभा चुनावों में हिंदुत्व की लहर पश्चिम से चली, तो दूसरे दल पूरे प्रदेश में साफ हो गए। सरकार के दो साल पूरे होने पर सहारनपुर में बेशक प्रधानमंत्री ने सिर्फ विकास की बात कही थी, लेकिन उनके मंच पर दूसरे नेताओं के भाषणों का मजमून हिंदुत्व ही था। इसके बाद कैराना प्रकरण को भी खूब गर्माया गया। अब मोदी की मेरठ और बिजनौर रैली उसी भावना को आगे बढ़ा सकती है।
बसपा के फार्मूले की भी टेस्टिंग
बीएसपी मुखिया मायावती
मोदी के रैली के कुछ दिनों बाद उसी मैदान में मायावती ने रैली की। वहां पर ताकत दिखाकर एक तरह से उन्होंने आने वाले चुनाव की तस्वीर पेश करने की कोशिश की थी। वह लगातार मुस्लिमों को यह संदेश देना चाहती हैं कि उनकी पार्टी ही भाजपा से सीधी लड़ाई में है। यही वजह है कि मायावती एक फरवरी को मेरठ में अपने समीकरण को मजबूत करने की कोशिश करेंगी।
रालोद के लिए स्थानीय सीटें अहम
बागपत और आसपास के जिले रालोद का गढ़ माने जाते हैं। यही वजह है कि चौधरी अजित सिंह ने बड़ौत में अपने मंच पर शरद यादव और एचडी देवगौड़ा को लाकर अपनी ताकत दिखाई। रालोद नहीं चाहता है कि मुजफ्फरनगर दंगे के बाद ध्रुवीकरण में उससे छिटका जाट वोटर फिर से भाजपा के पाले में आए। इसके लिए रालोद लगातार मुस्लिमों को साथ लाने का प्रयास कर रहा है। किसान राजनीति के सहारे दूसरी बिरादरियों को जोड़ने की भी मंशा है। पहले और दूसरे चरण का चुनाव रालोद के लिए भी अहम होंगे।
पिछला प्रदर्शन दोहराने की रणनीति
पिछले चुनाव में सपा ने मेरठ और आसपास के जिलों में बेहतर प्रदर्शन किया था। सहारनपुर में कांग्रेस ने भी बेहतर प्रदर्शन किया। सपा के पास मेरठ के आसपास के क्षेत्र में परंपरागत यादव वोटर प्रभावी भूमिका में नहीं हैं। इसीलिए पार्टी यहां गुर्जरों को लुभाने का काम लगातार कर रही है। खतौली से चुनाव लड़ रहे चंदन चौहान के दादा की स्मृति में हुए कार्यक्रम में खुद सीएम अखिलेश यादव आए थे। पूरी संभावना है कि अखिलेश और राहुल संयुक्त रैली भी करें।