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Meerut News: आस्था, तप और शिवभक्ति का प्रतीक है सावन की कांवड़ यात्रा

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त्रेता युग से जुड़ी है कांवड़ यात्रा की प्राचीन परंपरा
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संवाद न्यूज एजेंसी
हस्तिनापुर। सावन माह में निकलने वाली कांवड़ यात्रा का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। सावन माह के दौरान यह यात्रा आस्था, अनुशासन, सेवा और सनातन संस्कृति की जीवंत मिसाल बनकर सामने आती है।
प्राचीन जयंती माता शक्तिपीठ मंदिर के संस्थापक अध्यक्ष सुदेश कुमार ने बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कांवड़ यात्रा की परंपरा त्रेतायुग से जुड़ी हुई है। सावन का महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना जाता है। समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष का पान करने से भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया था, जिसके कारण उन्हें नीलकंठ कहा गया। ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम ने शिव के कंठ की जलन शांत करने के लिए हरिद्वार स्थित हर की पैड़ी से गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। इसे कांवड़ यात्रा की प्रारंभिक परंपराओं में से एक माना जाता है।
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मान्यता यह भी है कि त्रेतायुग में वनवास के दौरान भगवान श्रीराम ने गुरु वशिष्ठ के निर्देश पर कांवड़ में गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया था। इसके अलावा, रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना के बाद भी श्रीराम और माता सीता द्वारा भगवान शिव का जलाभिषेक किया गया।
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भगवान शिव के परम भक्त रावण के संबंध में भी लोकमान्यता है कि उसने युद्ध से पूर्व श्रावण मास में भगवान शिव की विशेष आराधना और जलाभिषेक किया था।
कांवड़ यात्रा के वर्तमान स्वरूप की प्रेरणा भक्त श्रवण कुमार से भी जोड़ी जाती है। मान्यता है कि उन्होंने अपने नेत्रहीन माता-पिता को बहंगी में बैठाकर विभिन्न तीर्थों की यात्रा कराई थी। कंधे पर दोनों ओर समान भार लेकर चलने की इसी व्यवस्था को आगे चलकर कांवड़ के स्वरूप से जोड़ा गया। त्रेतायुग से चली आ रही इस परंपरा में श्रद्धालु गंगा नदी से पवित्र जल लाकर शिवालयों में स्थापित शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं।
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