- एक छोटी सी चूक से भी हो सकती है खंडित
संवाद न्यूज एजेंसी
बहसूमा। कांवड़ यात्रा केवल भक्ति और आस्था का ही नहीं, बल्कि कठोर अनुशासन और धार्मिक मर्यादाओं के पालन का भी प्रतीक है। मान्यता है कि कंधे पर कांवड़ धारण करते ही शिवभक्त पर कई कठिन नियम लागू हो जाते हैं। जरा सी भी चूक होने पर यात्रा खंडित मानी जाती है। इसके बाद संगत गुरु द्वारा दिए गए दंड का पालन करना ही कांवड़ियों का धर्म होता है।
कस्बा स्थित शिव मंदिर के पुजारी सुभाष सेमवाल के अनुसार हरिद्वार, गोमुख और नीलकंठ से हर साल लाखों श्रद्धालु गंगाजल लेकर लौटते हैं। यात्रा के दौरान एक विशेष शब्दावली और मर्यादा का पालन किया जाता है जैसे पानी को जल, कुत्ते को भैरो, महिला को भोली, पुरुष को भोला, बैल को नंदी और भोजन को प्रसाद कहा जाता है। इस दौरान गाली-गलौज, नशा, द्वेष और पशुओं से दुर्व्यवहार पूरी तरह वर्जित है। शौच या विश्राम के बाद बिना स्नान किए दोबारा कांवड़ छूने की भी मनाही होती है।
घर के चूल्हे से लेकर यात्रा के रास्तों तक कड़े नियम
वर्षों से कांवड़ ला रहे शिवभक्त रविंद्र भगतजी, वीरेंद्र नागर, संजीव पोसवाल और सुधीर अहलावत बताते हैं कि जब तक कांवड़ियां घर नहीं लौट आता, तब तक उसके घर में सब्जी में तड़का (छौंक) भी नहीं लगाया जाता। लोक मान्यता है कि ऐसा करने से यात्रा में बाधा आ सकती है।
कांवड़ के अलग-अलग रूप और उनके नियम:
खड़ी कांवड़: विश्राम के दौरान इसे जमीन पर नहीं रखा जाता, बल्कि साथी के कंधे पर ही संभाला जाता है।
झूला कांवड़: जरूरत पड़ने पर इसे किसी पेड़ या बांस पर टांगा जा सकता है।
डाक कांवड़: इसमें श्रद्धालु समूह बनाकर बिना रुके, बारी-बारी से दौड़ते हुए निर्धारित समय में शिवालय पहुंचकर सामूहिक जलाभिषेक करते हैं।