जानीखुर्द। स्वामी समर्पणानंद सरस्वती (पंडित बुद्धदेव विद्यालंकार) की जयंती पर रविवार को स्वामी समर्पणानंद वैदिक शोध संस्थान और उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में गुरुकुल प्रभात आश्रम टीकरी, भोला-झाल में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वैदिक शोध संगोष्ठी की शुरुआत हुई।
प्रतिष्ठित वैदिक विद्वानों ने अपने शोध पत्रों का वाचन किया और ऋग्वेद मंडलमणिसूत्र ग्रंथ की उपादेयता प्रस्तुत की। वैदिक मंत्रों के साथ कार्यक्रम का उद्घाटन किया गया। स्वामी समर्पणानंद वैदिक शोध संस्थान के निदेशक प्रो. मानसिंह की अध्यक्षता में प्रथम सत्र का संचालन हुआ। इसमें एपेक्स यूनिवर्सिटी, जयपुर के कुलपति प्रो. सोमदेव शतांशु ने ऋग्वेद मंडलमणिसूत्र की महत्ता बताई। उन्होंने कहा कि विदेशी विद्वानों तथा उनका अंधानुकरण करने वाले कई भारतीय विद्वानों ने भी ऋग्वेद के बारे में विभिन्न भ्रांतियां फैला रखी हैं। ऐसी स्थिति में स्वामी द्वारा लिखित यह ग्रंथ सभी भ्रांतियों का सटीक निवारण करने में समर्थ है। वेदों को जानने के इच्छुक सभी लोगों को इस ग्रंथ का अवश्य अध्ययन करना चाहिए।
सत्र के मुख्य वक्ता फरीदाबाद के वैदिक विद्वान निरंजन लाल मंगल रहे, जिन्होंने अपने भाषण में वैदिक राष्ट्र की संकल्पना को समझाया। अन्य विद्वानों ने भी ग्रंथ से संबंधित विभिन्न विषयों को अपने शोध पत्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया।
आश्रम के कुलाधिपति पूज्य स्वामी विवेकानंद सरस्वती महाराज ने वेदों की महत्ता को बताते हुए अपनी संस्कृति, सभ्यता और इतिहास पर स्वाभिमान रखने के लिए लोगों को जागरूक किया। उन्होंने ज्ञानी, ध्यानी और सबसे बढ़कर स्वाभिमानी बनने का उपदेश दिया।
कार्यक्रम में प्रो. रणजीत बेहेरा, प्रो. काशीनाथ न्यौपाने, प्रो. राम नारायण शास्त्री, प्रो. सोमदेव शतांशु, डॉ. सोमवीर, डॉ. वेदव्रत, डॉ. भावप्रकाश, डॉ. रविप्रभात, डॉ. विनोद कुमार, डॉ. नीतीश कुमार आदि और गुरुकुल स्नातक व ब्रह्मचारी उपस्थित रहे।