मेरठ। डॉक्टरों के पर्चों से दवाइयों के जेनेरिक नाम गायब हैं। पर्चे पर जेनेरिक नाम लिखने के सरकार के आदेश हवाई हो गए हैं। दोबारा भेजे गए आदेश को भी एक साल से ज्यादा वक्त हो गया, मगर पालन नहीं किया जा रहा है। चिकित्सक ब्रांडेड दवाइयां ही लिख रहे हैं और इस आदेश को अव्यवहारिक बता रहे हैं।
जेनेरिक दवाएं बिना किसी पेटेंट के बनाई और वितरित की जाती हैं। इनके फॉर्मूलेशन पर पेटेंट हो सकता है, लेकिन उसकी सामग्री पर नहीं हो सकता। इन दवाओं के प्रचार-प्रसार पर कंपनियां कुछ खर्च नहीं करतीं, इसलिए यह सस्ती होती हैं। दूसरी तरफ, दवा कंपनियां ब्रांडेड दवा से बड़ा मुनाफा कमाती हैं। यही वजह है कि डॉक्टर जेनेरिक दवाएं लिखते ही नहीं और ब्रांडेड दवाओं का कारोबार दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।
दूसरी तरफ, स्वास्थ्य और औषधि विभाग को पता ही नहीं है कि यह निगरानी कौन कर रहा है कि चिकित्सक पर्चे पर जेनेरिक नाम लिख रहे हैं या नहीं। सीएमओ डॉ. राजकुमार का कहना है कि यह जिम्मेदारी ड्रग्स विभाग की होगी, क्योंकि उनके पास शासन से ऐसा कोई आदेश नहीं आया है कि इनकी निगरानी करनी है। वहीं, ड्रग्स इंस्पेक्टर पवन शाक्य का कहना है कि यह जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग की होनी चाहिए, चिकित्सकों को लाइसेंस उनके यहां से जारी किए जाते हैं।
जिले में 33 जन औषधि केंद्र
जनपद में 33 प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र हैं। प्रति केंद्र इनकम करीब तीन से छह लाख रुपये है, जो सालाना करीब 18-20 करोड़ रुपये के आसपास पहुंचती है। दूसरी तरफ, दवाओं की किल्लत के कारण सरकार की जन औषधि केंद्र के जरिये सस्ती दवाइयां देने की योजना परवान नहीं चढ़ पा रही है।
कुछ दिन किया अमल
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने जेनेरिक दवाओं से संबंधित 8 अक्तूबर 2016 के आदेश को दोबारा अप्रैल 2017 में प्रदेश सरकारों और उनके स्वास्थ्य विभागों को भेजा था, जिसमें जेनेरिक नाम के साथ दवाएं लिखने के लिए कहा गया था। यह भी आदेश हैं कि जेनेरिक दवा का नाम कैपिटल लेटर में लिखा जाए, जो पढ़ने में भी आए। कुछ चिकित्सकों ने इस पर अमल शुरू किया, लेकिन धीरे-धीरे यह व्यवस्था धड़ाम हो गई।
योजना अच्छी, पर व्यवहारिक नहीं
दवाओं के जेनेरिक नाम लिखने की सरकार की योजना तो अच्छी है, लेकिन व्यवहारिक नहीं है। यही वजह है कि यह आगे नहीं बढ़ पा रही है। अगर चिकित्सक जेनेरिक नाम लिखें भी, तो फार्मासिस्ट न होने के कारण मेडिकल स्टोरों पर उसे पढ़ेगा कौन? इसके अलावा कांबिनेशन भी इसकी वजह है, जेनेरिक दवाइयों को कांबिनेशन में देना मुश्किल है।
- डॉ. संदीप जैन, सचिव, आईएमए मेरठ शाखा
फार्मासिस्टों की कमी भी बड़ी वजह
प्रदेश में करीब एक लाख मेडिकल स्टोर हैं, जबकि फार्मासिस्ट लगभग 45 हजार हैं। इनमें कुछ फार्मासिस्ट कंपनियों में नौकरी भी करते हैं। ऐसे में जेनेरिक दवाइयां हों भी, तो उन्हें समझकर मरीज को देने वाले नहीं हैं। ज्यादातर मेडिकल स्टोरों पर लंबे समय से कार्य करने वाले युवक ही फार्मासिस्ट का कार्य कर रहे हैं। मेरठ में करीब 3200 मेडिकल स्टोर (होलसेल और रिटेलर) हैं।
कीमत के हिसाब से एमआरपी करें तय, तो हो अमल
जेनेरिक दवाएं भी अलग-अलग कंपनियां अलग-अलग कीमत पर बेचती हैं। अगर सरकार कीमत के हिसाब से उनकी एमआरपी तय करेगी, तो ही इसका फायदा होगा। इसके अलावा बाकी खर्चों पर भी सख्ती दिखानी होगी, नहीं तो दवाओं के अलावा बाकी इलाज के खर्चे बढ़ा दिए जाएंगे।
- रजनीश कौशल, महामंत्री, केमिस्ट ड्रगिस्ट एसोसिएशन