फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

युधिष्ठिर ने गंगा किनारे किया था दीपदान

विज्ञापन
हस्नितापुर स्थित गंगा। - फोटो : MAWANA
विज्ञापन
हस्तिनापुर। कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान मेले का इतिहास हस्तिनापुर से जुड़ा माना जाता है। महाभारत युद्ध में मारे गए योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को गंगा किनारे ले जाकर दीपदान कराया था। यह कहना कर्ण मंदिर के महंत शंकर देव जी महाराज का है।
विज्ञापन

हस्तिनापुर नगरी आज भी कई ऐतिहासिक परंपराओं की गवाह है। इसके बंटवारे को लेकर कौरव और पांडव के बीच कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध हुआ। जिसमें लाखों योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए गंगा में दीपदान की परंपरा शुरू हुई थी। कार्तिक पूर्णिमा गंगा मेले में दीपदान प्रथा की शुरुआत भगवान कृष्ण ने कराई थी। उसी समय से लोग हस्तिनापुर के साथ मखदूमपुर में भी कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान करने लगे। इससे यहां दीपदान की प्रथा शुरू हुई।
सगे संबंधी और योद्धाओं के लिए शुरू की थी परंपरा
इतिहास के अनुसार कौरव और पांडवों के बीच हुए महाभारत युद्ध में लाखों योद्धा मारे गए थे। इनमें पांडवों के सगे-संबंधी भी शामिल थे। युद्ध के बाद पांडवों का मन व्याकुल हो उठा। उनमें राजपाट के प्रति विरक्ति का भाव उत्पन्न होने लगा तो भगवान श्रीकृष्ण को चिंता होने लगी।
विज्ञापन

मुक्ति का उपाय तलाशा
भगवान श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर ने अपने संबंधियों की आत्मा की मुक्ति का उपाय जानने के लिए ऋषि-मुनियों से विमर्श किया। इस पर ऋषि-मुनियों के कहे अनुसार वे कार्तिक माह में भैया दूज पर्व संपन्न होने पर हस्तिनापुर से कुछ दूर गंगा किनारे आए थे। सगे संबंधी और योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए ऋषि-मुनियों द्वारा बताए गए अनुष्ठान किए गए। इसके लिए कौरव और पांडवों के साथ भगवान श्रीकृष्ण कई दिनों तक गंगा किनारे रुके।
संबंधियों की आत्मा की शांति के लिए चतुर्दशी की संध्या में दीपदान करने पर पांडवों के व्याकुल मन को शांति मिली थी। श्रीकृष्ण गंगा में डुबकी लगाकर पांडवों के साथ हस्तिनापुर लौट गए थे। वर्तमान में गंगा किनारे हस्तिनापुर, मखदूमपुर, विदुर कुटी, गढ़, खरखाली, बिजनौर बैराज समेत विभिन्न स्थानों पर कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान मेला लगाया जाता है।
सवा मन सोना गरीबों को दान करते थे कर्ण
कस्बा स्थित कर्ण मंदिर आज भी विश्व विख्यात है। यह आज भी उसी मुद्रा में मौजूद है। यह स्थान कर्ण घाट के नाम से जाना जाता है। इसी स्थान पर महाभारत काल में कर्ण गंगा में स्नान कर मां कामाख्या देवी की पूजा करके प्रतिदिन सवा मन सोना गरीबों को दान करते थे।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें