मेरठ। शायर मुरसलीन माहिर ने पढ़ा कि मेरी खता है मोहब्बत न हो सकी मुझसे। जरूरी थी जो इबादत न हो सकी मुझसे। यही सबब है मैं आज तक परेशां हूं, के वालिदेन की खिदमत न हो सकी मुझसे। हम खयाल फाउंडेशन के जेरे एहतमाम में रविवार को एक नशिस्त लिसाड़ी गेट में हाजी आदिल चौधरी के आवास पर हुई। इसमें मुरसलीन माहिर के अलावा कई शायरों ने शायरी के जरिये श्रोताओं को सराबोर कर दिया।
इरशाद बेताब ने पढ़ा कि मंजिलें मिलेंगी ही और मिलेंगी ताबीरें, जागती आंखों से ख्वाब देखें हैं मैंने। शायर इरशाद बेताब इस शेर से मुस्तकबिल की उम्मीदें जगा दीं। दिल्ली से आए शायर प्रोफसर फारूख बख्शी ने पढ़ा कि कोई कब जानके सरगर्मी सफर होता है। घर तो जैसा भी हो हर हाल में घर होता है। इस दौरान शायर डॉ. जकी तारिक, सरताज राही किथौरवी, गुफरान रशीद गुलावटी, अशोक साहिब गुलावटी, अदना मेरठी, प्रोफेसर यूनुस गाजी आदि ने भी अपने कलाम पढ़कर श्रोताओं को मोह लिया।