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Meerut News: डीजे की धुन में गायब हो रही ढोलक की थाप

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दयाराम
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रविंद्र चौहान
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हस्तिनापुर। समय के साथ-साथ प्राचीन परंपराओं में भी बदलाव नजर आ रहे हैं। हमारी प्राचीन सभ्यता से जुड़ा ऐसा ही एक बड़ा बदलाव कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान मेले में भी देखा और महसूस किया जा रहा है। सतयुग से लेकर द्वापर तक सूचना व वीरगाथा का परिचायक रहा ढोल और धार्मिक कार्यक्रमों पर कानों में गूंजती ढोलक की थाप आज की आधुनिकता में गुम होने लगी है। इसके चलते न सिर्फ आज यह पौराणिक संस्कृति विलुप्त होने की कगार पर पहुंचने लगी है बल्कि इस पेशे से जुड़े लोगों का रोजगार भी खत्म होने लगा है।
हमारी प्राचीन संस्कृति के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान मेले में ढोलक की मधुर आवाज महत्वपूर्ण स्थान रखती थी। परंतु अब युवा पीढ़ी को ढोलक की मधुर आवाज पसंद नहीं है। इस कारण हमारे बीच से ढोल नगाड़े की धुन और ढोलक की थाप कम होती जा रही है। मखदूमपुर गंगा घाट पर 1929 से कार्तिक पूर्णिमा मेले का आयोजन किया जाता है। वहीं हस्तिनापुर के बूढ़ी गंगा घाट पर इसे महाभारत कालीन बताया जाता है। इन मेलों में ढोलक की थाप के साथ युवाओं की टोली, गीत गाने वालों का मस्ती भरा शोर, स्वच्छ पारंपरिक लोक गीत गंगा किनारे पर लोगों के उत्साह को दोगुना कर देते थे। अब समय के साथ गीतों की परंपरा विलुप्त होती जा रही है। युवा वर्ग अपने पूर्वजों की इस धरोहर को भूलते जा रहे हैं। अब बदले दौर में लोग डीजे की धुन पर थिरकते हैं। पहले के मेलों में लोग पारंपरिक तरीकों से गंगा पूजन के लिए जाते थे परंतु आज डीजे और हुड़दंग ने मेला स्थल का माहौल बदल दिया है। (संवाद)
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आधुनिकता की दौड़ में विलुप्त हो रही प्राचीन संस्कृति

देव कार्य से पहले ढोल की बारह ताल या फिर मशकबीन संग सेना की वीरता के किस्सों का एक दौर था। जब ये धार्मिक संस्कृति व वीरता के बखान करने के बेहतर माध्यम होते थे। मगर आज आधुनिकता की दौड़ में डीजे ने इसकी जगह ले ली है। इसके चलते हमारी प्राचीन परंपरा से जुड़ी ढोलक की थाप लुप्त होने लगी है। -गोपाल शर्मा, मवाना



ढोलक की थाप समाप्त होने की कगार पर

आधुनिकता के इस दौर में ढोलक विद्या को नुकसान पहुंचाने के लिए जितने डीजे और बैंड जिम्मेदार हैं, उतने ही समाज के ठेकेदार भी जिम्मेदार हैं। जिन्होंने इसे न सिर्फ जात-पात के नाम पर बांटने का काम किया है, बल्कि इस विद्या से जुड़े लोगों का सही मेहनताना भी नहीं दिया गया। इसके चलते आज यह कला खत्म होने की कगार पर है। -डाॅ. दयाराम, हस्तिनापुर



ढोलक बजती थी तो लगता है हमारी प्राचीन परंपरा है

प्राचीन परंपरा के अनुसार शादी विवाह का माहौल हो या फिर गंगा मेला और धार्मिक कार्यों में जाने के समय ढोलक की थाप पर जो मधुर गीत सुनाई देते थे वह आज भी कानों में गूंजते हैं। परंतु वर्तमान में डीजे ने ढोलक की थाप को समाप्त कर दिया है। धार्मिक कार्यक्रम के अवसर पर ढोलक बजती थी तो लगता था कि यही हमारी प्राचीन परंपरा है। डीजे पर ऐसा नहीं लगता। -ऋषिपाल मालिक
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बैल-बुग्गी पर अब नहीं सुनाई देते धार्मिक गीत

आज जिस तरह से डीजे की धुन बज रही है उससे तो भविष्य में ढोल और ढोलक की यह प्राचीन विद्या केवल किताबों तक ही सिमटकर रह जाएगी। इसके लिए आज हम सबको मिलकर प्रयास करना होगा। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर जब श्रद्धालु गंगा मेले में जाते थे तो उनकी बैल-बुग्गी में ढोलक की थाप पर धार्मिक गीत मां को आकर्षित करते थे परंतु आज ऐसा नहीं है। -कलीराम, किशोरपुर

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