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Meerut News: नई पीढ़ी को सुनाएं मनोज तलवार, यशवीर सिंह के शौर्य की कहानी

Tue, 13 Jun 2023 04:08 PM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ

सार

1999 के कारगिल युद्ध में मेरठ के दोनों लाल कैप्टन मनोज तलवार और यशवीर सिंह दुश्मन का काल बन गए थे। युवाओं को इनके शौर्य से प्रेरणा लेनी चाहिए।
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शहीद मेजर मनोज तलवार का फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मेरठ। हौसले और जांबाजी का दूसरा नाम है कैप्टन मनोज तलवार और यशवीर सिंह है। 1999 के कारगिल युद्ध में मेरठ के दोनों लाल दुश्मन का काल बन गए थे। एक के बाद एक सफल ऑपरेशन में हिस्सा लेकर जांबाजों ने कारगिल की चोटियों पर तिरंगा फहराया था। युवाओं को इनके शौर्य से प्रेरणा लेनी चाहिए। इनकी कहानी सुनकर अपने अंदर देश भक्ति का जज्बा जगाना चाहिए। 13 जून को कैप्टन मनोज तलवार और सेकेंड राजपूताना राइफल के कंपनी हवलदार मेजर यशवीर सिंह देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे।

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जांबाज ने 19 हजार फीट पर लहराया था तिरंगा
मवाना रोड स्थित डिफेंस कॉलोनी निवासी मनोज तलवार का जन्म 29 अगस्त 1969 गांधी कॉलोनी मुजफ्फरनगर में हुआ। 12वीं के बाद एनडीए की परीक्षा पास की। वर्ष 1992 में कमीशन प्राप्त कर ‘महार रेजीमेंट’ में लेफ्टीनेंट पद पर नियुक्त हुए। प्रथम तैनाती जम्मू-कश्मीर में हुई। कमांडो की विशेष ट्रेनिंग के बाद उन्हें असम में उल्फा उग्रवादियों का सफाया करने के लिए भेजा गया।
 

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फरवरी 1999 में मेजर मनोज तलवार की रेजीमेंट फ़िरोजपुर पंजाब में तैनात हुई। लेकिन कुछ कर गुजरने की चाह रखने वाले मेजर मनोज तलवार ने सियाचिन में नियुक्ति मांग ली। सियाचिन जाने से पहले मेजर मनोज तलवार मार्च में घर आए थे। छुट्टी खत्म होने से कुछ दिन पहले माता-पिता, भाई व बहन ने उनसे विवाह करने की बात कही। इस पर उन्होंने कहा कि मां मेरा समर्पण तो देश के साथ जुड़ चुका है। अभी तो उसकी हिफाजत के लिए वचनबद्ध हूं। पता नहीं क्या हो। मैं किसी लड़की का जीवन बर्बाद नहीं करूंगा। इसके बाद वे कारगिल चले गए। युद्ध में उन्हें 19 हजार फीट ऊंची चोटी पर कब्जा करने का टास्क मिला। उन्होंने अपने जवानों के साथ दुश्मन को खदेड़कर चोटी पर तिरंगा फहराया।

वीर चक्र विजेता यशवीर ने मारे 50 दुश्मन
मूलरूप से बागपत के ग्राम सिरसली निवासी यशवीर सिंह का परिवार रोहटा रोड फाजपुर क्षेत्र में रहता है। वीर नारी मुनेश देवी ने बताया कि उनके पति यशवीर सिंह को तोलोलिंग चोटी पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गई। यह पर्वत चोटी श्रीनगर-लेह राजमार्ग की एकमात्र प्रमुख कड़ी है। कई बॉलीवुड मूवी में भी यशवीर सिंह की वीरता को दिखाया जाता है। मुनेश देवी ने बताया कि इस पर्वत चोटी पर कब्जा किए बिना दुश्मन को पीछे नहीं भगाया जा सकता था।

तोलोलिंग पर अगर पाकिस्तान की मजबूत पकड़ हो जाती तो कारगिल युद्ध का पूरा स्वरूप बदल जाता। उन्होंने बताया कि 12 जून को सेकेंड राजपूताना राइफल ने इस प्वाइंट पर हमला किया। मेजर विवेक गुप्ता पलटन का नेतृत्व कर रहे थे। दुश्मनों की गोलाबारी के बीच हवलदार यशवीर सिंह सीने पर दो गोली खाने के बाद भी ग्रेनेड लेकर पाकिस्तान सैनिकों के बंकर में घुस गए। 40 से 50 दुश्मनों को मारकर वह शहीद हो गए। 13 जून को तोलोलिंग पर तिरंगा फहराया गया। यशवीर सिंह के इस साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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शहीद के दोनों बेटे संभाल रहे पेट्रोल पंप का काम
शहीद हवलदार मेजर यशवीर सिंह को मरणोपरांत वीर चक्र मिला था। तत्कालीन सरकार की तरफ से पेट्रोल पंप के लिए जमीन मिली थी। शुरुआती दौर में शहीद की पत्नी मुनेश देवी ने ही सारी जिम्मेदारी देखी थी। अब काफी समय से दोनों बेटे पेट्रोल पंप की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। भारत सरकार की तरफ से शहीद परिवार को 16 बीघे जमीन भी गांव में दी गई थी।बड़े बेटे उदय सिंह और छोटे बेटे पंकज तोमर ने कहा कि वह भी अपने पिता की तरह देश सेवा करना चाहते थे। लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। उन्हें अपने पिता पर गर्व है।

कारगिल में ये हुए थे शहीद
13 जून 1999: मेजर मनोज तलवार और सीएचएम यशवीर सिंह।
28 जून 1999: लांस नायक सत्यपाल सिंह।
3 जुलाई 1999: नायक जुबैर अहमद।
5 जुलाई 1999: ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव।
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