अधिवक्ताओं के प्रदर्शन से सुर्खियों में आए तहसीलदार सदर उमेशचंद्र शुक्ला के पत्र ने फिर हलचल मचा दी है। डीएम के नाम भेजे गए इस पत्र में तहसीलदार ने कहा है कि जिल्लत की जिंदगी जीने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर है। तहसीलदार ने इस पत्र में डीएम को उन्हें अधिकार विहीन करने के फैसले पर भी चुनौती दी है।
पिछले दिनों सदर तहसीलदार के न्यायिक कार्य को लेकर अधिवक्ताओं ने डीएम को घेरते हुए हंगामा काटा था। इस पर डीएम ने तहसीलदार के न्यायिक अधिकार रोकते हुए अधिवक्ताओं की शिकायतों पर जांच एडीएम वित्त रवींद्र कुमार को सौंप दी। डीएम के इस फैसले को ही तहसीलदार ने चुनौती दे डाली है।
कहा है कि तहसीलदार के न्यायिक अधिकारों में कटौती का अधिकार राजस्व परिषद को है, डीएम को नहीं है। इसके अलावा उन्होंने एडीएम वित्त द्वारा अधिवक्ताओं की शिकायत पर की न्यायिक वादों की जांच रिपोर्ट पर भी सीधे सवाल खड़े किए हैं।
मंगलवार को तो तहसीलदार उमेशचंद्र शुक्ला ने डीएम को एक और पत्र देते हुए यहां तक कह दिया कि जिल्लत की जिंदगी जीने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर है। कह दिया कि उन्हें बेवजह परेशान किया जा रहा है। मथुरा में तैनाती के बाद से अबतक उन्हें वेतन तक नहीं मिला है।
मुझे जानबूझकर परेशान किया जा रहा है। अपनी यह पीड़ा लिखा पत्र डीएम साहब की कोठी पर दे आया हूं।
- उमेशचंद्र शुक्ला, तहसीलदार, सदर
उन्हें अभी तक ऐसे किसी पत्र की जानकारी नहीं है। फिर भी कोई पत्र तहसीलदार ने दिया है, उसके अनुरूप विधिक कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
- सर्वज्ञराम मिश्र, डीएम