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Meerut News: किशोर देते हैं धमकी...मोबाइल गेम नहीं खेलने दिया तो दे देंगे जान

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डॉ. तरुण पाल
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मेरठ। गंगानगर के रहने वाले दंपती 16 साल के किशोर को लेकर गढ़ रोड स्थित एक मनोचिकित्सक के क्लीनिक पर पहुंचे। बोले- डॉक्टर साहब, हमारे बेटे को बचा लो। इसे मोबाइल की लत है। पढ़ता नहीं है, दिनभर मोबाइल पर गेम खेलता है। मोबाइल छीन लिया तो आत्महत्या करने की धमकी दे रहा है। मनोचिकित्सक ने उसकी काउंसिलिंग की। उसे कुछ दवाएं दीं।
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यह परेशानी अकेले इस किशोर की नहीं है। मेरठ में शहर के 20 मनोचिकित्सकों के पास मोबाइल की लत और बहुत झगड़ालू आदत के 50-55 किशोर हर रोज इलाज के लिए आ रहे हैं। इनकी उम्र 13 से 17 साल है। इनकी आदत और लत से परेशान होकर परिजन इन्हें लेकर आ रहे हैं। दरअसल, किशोरों की जिंदगी मोबाइल स्क्रीन पर सिमटती जा रही है। उनका स्क्रीन टाइम बढ़ता जा रहा है और वे मोबाइल डिसऑर्डर के शिकार हो रहे हैं। इससे उनका मन पढ़ाई में नहीं लग रहा है और वे हिंसक भी हो रहे हैं। मनोचिकित्सकों के मुताबिक मोबाइल गेमिंग की लत ठीक वैसी ही है जैसे गांजे की लत। गाजियाबाद में कोरियन गेम की लत की शिकार तीन नाबालिग बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर जान दे दी। मेरठ में भी मोबाइल गेमिंग की लत के शिकार बच्चों, किशोरों और युवाओं की बड़ी तादाद है। इनकी लत छुड़ाने के लिए काउंसिलिंग के साथ-साथ दिमाग की दवाओं का सहारा भी लेना पड़ रहा है।

केस स्टडी-1
मोबाइल छीना तो की खुदकुशी की कोशिश
जागृति विहार का रहने वाला 17 वर्षीय किशोर मोबाइल गेम की लत लग गई। वह रात तीन बजे तक गेम खेलता और दिन भर सोता। नाराज होकर उसके पिता ने मोबाइल छीना तो उसने आत्महत्या करने की कोशिश की। उसका मनोरोग विशेषज्ञ के यहां इलाज चल रहा है। एंगर मैनेजमेंट थेरेपी दी जा रही है।
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केस स्टडी-2
गेम खेला तो हो गई सोशल एंग्जाइटी की शिकार
शास्त्रीनगर की रहने वाली 15 साल की लड़की को ऑनलाइन क्लासेस के लिए पिता ने मोबाइल खरीदकर दिया। वह उसमें गेम खेलने लगी। दिनभर वह उसे में लगी रहती। किसी से बात नहीं करती। परेशान परिजनों ने मनोचिकित्सक को दिखाया तो पता चला कि उसे सोशल एंग्जाइटी हो गई है। उसका भी इलाज चल रहा है।
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मोबाइल की लत से मानसिक बीमार न बनें
बच्चों को मोबाइल की लत न लगने दें। अगर उन्हें गेमिंग की लत लग गई तो यह एक तरह की बीमारी है। यह बहुत खतरनाक हो सकती है। गांजे जैसी लत है। इससे उनकी पढ़ाई और सामाजिक परिवेश प्रभावित होता है। मेडिकल में इस तरह के केस आते हैं तो काउंसिलिंग की जाती है।
- डॉ. तरुण पाल, मनोचिकित्सक, एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज
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रील और रियल दुनिया का फर्क समझें
आज के दौर में परिजनों की जिम्मेदार बहुत बढ़ गई है। उन्हें बच्चों, किशोरों-युवाओं को समझाना चाहिए कि रील और रियल दुनिया अलग-अलग है। रील या गेमिंग लाइफ को जिंदगी को हिस्सा न बनाएं। इसे खेल की तरह ही समझें। शहर के मनोचिकित्सकों के पास इस तरह के हर रोज तीन से चार केस आ रहे हैं।
- डॉ. रवि राणा, मनोचिकित्सक

दिमाग गेम पर आश्रित हो जाता है
मोबाइल पर कुछ ऐसे गेम हैं जो बच्चों-किशोरों का दिमाग अपने पर आश्रित करा लेते हैं। उन्हें गेम खेलने पर ही खुशी, गम और जोश का एहसास होता है। रोक लगाने पर वे खुद को अधूरा समझते हैं। बाद में यह लत मानसिक बीमारी तक का रूप ले लेती है। फिर इसका इलाज लंबा चलता है।
- डॉ. कमलेंद्र किशोर, मनोचिकित्सक

कोरियाई लवर गेम से ऐसे जुड़ रहीं लड़कियां
गाजियाबाद की घटना में सुसाइड नोट में के-पॉप का जिक्र सामने आया है। के पॉप कोरिया की लोकप्रिय संगीत शैली है। भारत में भी यह शैली काफी पसंद की जाती है। कोरिया के कई म्यूजिक ग्रुप इस शैली पर प्रस्तुति देते हैं। इनके वीडियो इंस्टाग्राम व यूट्यूब पर बड़ी संख्या में हैं। मेरठ में भी बड़ी संख्या में युवा व लड़कियां इनके वीडियो व रील देखते हैं। साइबर अपराधी अक्सर लोगों की पसंद का पता लगाकर उन्हें जाल में फंसाते हैं। के-पॉप को पसंद करने वालों को जाल में फंसाने के लिए मशूहर के।पॉप ग्रुप के सदस्यों से दोस्ती का झांसा देते हैं। उन्हें लिंक आदि भेजकर कोरियाई लवर गेम से जोड़कर टास्क दिए जाते हैं। किशोर उनके जान मेें फंसकर घातक कदम उठाते हैं।

डॉ. तरुण पाल

डॉ. तरुण पाल

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