हस्तिनापुर। तीर्थधाम चिदायतन प्रतिष्ठा महामहोत्सव के चौथे दिन का शुभारंभ शांति जाप और भगवान की पूजन-वंदन के साथ हुआ। इंद्र सभा में मंगलाचरण के बाद मुनिवर निर्मोही को वंदन आदि गीतों से सर्वार्थसिद्धि भोपाल की कन्याओं व अष्ट देवियों द्वारा सुंदर नृत्य की प्रस्तुति दी गई।
राजा शांतिकुमार का भव्य जन्मदिवस मनाया गया, जहां चारों ओर मंगलवाद्य, तोरणद्वार, वंदनवार आदि से सुसज्जित भव्य मंच पर महाराज दर्पण में प्रतिबिंब देखते हुए अचानक उन्हें मुनिराज की आकृति नजर आई। उन्होंने उसी क्षण संसार को छोड़ने का भाव बनाकर घरबार त्यागने दिया। क्षण भर में परिवर्तन, संसार की क्षणभंगुरता व संसार की असारता का आभास होते ही उनके पूर्व के 12 भवों का मनमोहक एवं मार्मिक मंचन किया गया। राज-वैभव छोड़कर उन्होंने जिनदीक्षा धारण करने का संकल्प लिया। इस मौके पर बारह भावनाओं के चिंतन से सारा पांडाल भक्तिमय शांत हो गया। लोकांतिक देवों ने आकर श्री शांतिकुमार के वैराग्य की अनुमोदना की। स्वर्ग से सुरपति सर्वार्थसिद्धि नामक पालकी लेकर आए।
कार्यक्रम में भक्ति गीतों की अद्भुत प्रस्तुति हुई। पंचकल्याणक के प्रमुख एवं रोचक दृश्यों में देवों और मानवों के बीच पालकी उठाने को लेकर नोकझोंक का भी मंचन हुआ।
दीक्षावन में प्रवचन सत्र में प्रथम वक्ता के रूप में बालब्रह्मचारी हेमंत भाई गांधी, सोनगढ़ एवं दूसरे वक्ता के रूप में पंडित राजेंद्र जैन, जबलपुर ने तपकल्याणक पर वक्तव्य दिया। सायंकालीन सत्र में जिनेंद्र भक्ति का आयोजन हुआ।
महाभारत का मंचन हुआ
मंच संचालक संजय शास्त्री ने बताया कि सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में वीतरागी महाभारत नाटिका का मंचन भी हुआ। इसमें 200 से भी अधिक कलाकारों ने महाभारत को एक नए दृष्टिकोण से दिखाने का प्रयास किया। जहां भीष्म की प्रतिज्ञा, लाक्षागृह, द्रौपदी का स्वयंवर, द्रौपदी का अपमान, कीचक की वासना व वैराग्य, भीष्म का वैराग्य, कर्ण और अभिमन्यु का युद्ध, अभिमन्यु की संल्लेखना, कृष्ण और जरासंध का युद्ध, दुर्योधन का वैराग्य, नेमिनाथ-जिनेंद्र की स्तुति, समवशरण और ओमकार ध्वनि, द्वारिका दहन, पांडवों का द्वारिका गमन, पांडवों का समवशरण में गमन, पांडव मुनिराजों पर उपसर्ग और तीन पांडवों का मोक्ष व स्वर्ग का दृश्य सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया। पांडाल में वीतरागी महाभारत के मंचन ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।