मौलाना मदनी ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष स्पष्ट किया गया कि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने लक्सर (हरिद्वार) की किसी पंचायत के फरमान को फतवा समझने की गलती की है और सिर्फ हिंदी के एक अखबार में प्रकाशित समाचार को आधार बनाकर फैसला दे दिया। जबकि खबर के अध्ययन से भी यह प्रकट होता है कि वह सिर्फ पंचायती फरमान है और इसका फतवे से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है।
मौलाना मदनी ने कहा कि फतवा किसी पंचायत से नहीं, बल्कि दारुल इफ्ता (फतवा विभाग) या किसी विद्वान मुफ्ती के माध्यम से ही दिया जाता है और इसकी हैसियत सिर्फ पूछने वाले के लिए शरई मसले पर मशविरा और मार्गदर्शन है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से मामले में स्टे मिलने पर संतुष्टि जताते हुए कहा कि देश के कोने कोने में दारुल इफ्ता धार्मिक मार्गदर्शन का कर्तव्य अंजाम दे रहे हैं।
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