- प्लांट ब्रीडिंग के जरिए नई प्रजाति पैदा नहीं की जा सकी।
- जीन में बदलाव के प्रयास भी किए गए
- एग्रोनोमिकल प्रयास कारगर नहीं रहे।
- बायो तकनीक से प्लांट ब्रीडिंग की कोशिश नाकाम
- पैथोलॉजिकल प्रयास भी सफल नहीं रहे।
- मृदा विज्ञानी भी नाकाम रहे।
- हाइड्रोफोनिक्स जैव तकनीक भी कारगर नहीं रही।
- ग्राफ्टिंग की कोशिशें भी नाकाम रहीं।
इसकी व्यावसायिक खेती उन इलाकों के लिए बेहद लाभकारी होगी, जहां की जमीन बंजर और उपजाऊ नहीं हैं। इसकी खेती से रोजगार भी मिलता है।
जेट्रोफा मिशन
विज्ञानी भी हार मानने को तैयार नहीं, शोध जारी
30 प्रतिशत तेल निकलता है प्रति ग्राम बीज से
05 साल की उम्र से देने लगता है बीज
325 लोगों को मिलता है रोजगार प्रति हेक्टेयर
डॉ. सेंगर और प्रोफेसर आरएस कुरील का फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
सरदार वल्लभ भाई पटेल प्रौद्योगिकी एवं कृषि विवि के प्रौद्योगिकी विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर आरएस सेंगर ने बताया कि यह बंजर और अनउपजाऊ भूमि के लिए बहुत ही उपयोगी है। जिस जमीन पर कोई खेती नहीं होती। वहां इसका विकास किया जा सकता। हालांकि इसकी उत्पादकता बढ़ाने के लिए लगातार 10 साल तक शोध किया गया, लेकिन इसके सार्थक परिणाम सामने नहीं आए। जैव तकनीक से लेकर ग्राफ्टिंग तक की सभी तकनीक अपनाई गई, लेकिन बात नहीं बनी। उन्होंने बताया कि पूरे देश से जेट्रोफा की लगभग सभी प्रजातियों के जर्म प्लाज्मा एकत्रित किए गए थे, लेकिन अशानुरूप सफलता नहीं मिली।
शोध जारी, परिणाम सार्थक होंगे : कुरील
कृषि मंत्रालय भारत सरकार में नेशनल वेजिटेबल ऑयल बोर्ड डिवीजन के निदेशक प्रोफेसर आरएस कुरील ने कहा कि बिना तकनीकी विकास के प्रोजेक्ट को लॉच किया गया था, इसलिए इसके उचित परिणाम सामने नहीं आए। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्याल में प्लांट ब्रीडिंग के जरिए जेट्रोफा की उत्पादकता बढ़ाने के लिए सराहनीय काम किया जा रहा है। अब कृषि मंत्रालय शोध के लिए सीधे राज्य सरकारों को मदद कर रहा है। कृषि विज्ञानी लगातार इस पर काम कर रहे हैं। उम्मीद है कि इसके सार्थक परिणआम सामने आएंगे। प्रो. कुरील आचार्य नरेंद्रदेव कृषि विश्वविद्यालय फैजाबाद और बीआर अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय इँदौर के वाइस चांसलर भी रह चुके हैं।
शोध जारी रखने की जरूरत: प्रो. गया प्रसाद
सरदार बल्लभ भाई पटेल प्रौद्योगिकी एवं कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर गया प्रसाद ने कहा कि विज्ञानियों को इस पर लगातार शोध जारी रखना चाहिए। जेट्रोफा से उत्पादित बायोडीजल बेहद कारगर विकल्प हो सकता है। शोध की सफलता से देश डीजल के मामले सक्षम हो सकता है।
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