सेंट्रल मार्केट में स्थित कृष्णा किडस अस्पताल में कार्रवाई से पहले खाली होता अस्पताल। .......
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सेंट्रल मार्केट में सुप्रीम कोर्ट के सीलिंग आदेश ने केवल इमारतों को ही नहीं बल्कि सैकड़ों परिवारों की उम्मीदों को भी झकझोर कर रख दिया है। सालों से सेवा दे रहे कर्मचारियों के चेहरे पर अपनी नौकरी खोने और परिवार के भरण-पोषण की चिंता साफ झलक रही थी।
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद से ही स्कूल और अस्पताल संचालकों की रातों की नींद उड़ गई। देर रात तक स्कूलों में ब्लैकबोर्ड, फर्नीचर, डेस्क और ऑफिस का रिकॉर्ड पैक करने का काम चलता रहा। वहीं अस्पतालों में बेड खाली किए गए और दवाओं के स्टॉक को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। मंगलवार सुबह जब संचालक दोबारा अपने संस्थानों पर पहुंचे तो वहां सन्नाटा और मायूसी पसरी हुई थी।
अभिभावक बोले- एडमिशन लिए ही क्यों?
इन दिनों स्कूलों में नए सत्र के दाखिले चल रहे हैं। सुबह जब अभिभावक अपने बच्चों को लेकर पहुंचे तो वहां का माहौल देखकर दंग रह गए। कुछ स्कूलों पर स्कूल बंद होने का पोस्टर चस्पा था। इस दौरान स्कूल प्रबंधकों और अभिभावकों के बीच तीखी नोकझोंक भी हुई। अभिभावकों का कहना था कि जब संचालकों को पता था कि सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है तो उन्होंने नए एडमिशन क्यों लिए। क्षेत्र के निवासी अभिभावकों ने तर्क दिया कि छोटे बच्चों का दाखिला घर के पास होने के कारण कराया गया था। अब अगर बच्चों को दूर के स्कूलों में शिफ्ट करना पड़ा तो उनकी सुरक्षा और आवाजाही की परेशानी बढ़ जाएगी।
स्टाफ का दर्द: अब कहां जाएंगे हम?
सीलिंग की आशंका ने सबसे गहरा घाव उन कर्मचारियों को दिया है जो यहां पिछले 10-15 वर्षों से काम कर रहे हैं। स्कूल और अस्पताल के स्टाफ में छाई मायूसी ने माहौल को गमगीन कर दिया। सालों से एक ही संस्थान में काम करने वाले पुराने स्टाफ के सदस्य अपने आंसू नहीं रोक पा रहे थे। उन्हें डर है कि एक झटके में उनकी रोजी-रोटी छिन जाएगी। हमारे परिवार का पेट कैसे पलेगा? इस उम्र में अब हम नई नौकरी के लिए कहां भटकेंगे? ये सवाल हर कर्मचारी की जुबान पर थे। खुद मुश्किल में फंसे स्कूल और अस्पताल प्रबंधक अपने स्टाफ को दिलासा देते नजर आए हालांकि उनके अपने चेहरों पर भी अनिश्चितता की लकीरें साफ थीं।
सेंट्रल मार्केट में स्थित कृष्णा किडस अस्पताल में कार्रवाई से पहले खाली होता अस्पताल। ....... - फोटो : Archive