अब जब रालोद भाजपा के साथ है तो सपा के लिए चुनौती दोगुनी हो गई है,लेकिन इन सबके बीच यूपी में बसपा के बिखराव का सपा फायदा उठाने की मशक्कत कर रही है। अगर ऐसा हुआ तो सपा के सियासी कद और ताकत दोनों में इजाफा हो जाएगा। हालांकि इस बार सपा में सबसे बड़ी चुनौती टिकट के लिए आपसी खींचतान की भी रहेगी।
सरधना से अतुल प्रधान, शहर सीट से रफीक अंसारी, किठौर से शाहिद मंजूर मौजूदा विधायक हैं और इनका टिकट भी लगभग पक्का है। लेकिन हस्तिनापुर से पूर्व विधायक योगेश वर्मा, पूर्व मंत्री प्रभुदयाल वाल्मीकि और प्रशांत गौतम के अलावा अब महापौर का चुनाव लड़ चुकीं दीपू मनोठिया टिकट की दावेदार हैं। वहीं, मेरठ दक्षिण और सिवालखास से टिकट के लिए दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है। सिवालखास में अपने दम पर जाट और किसान वोटों को सहेजने की चुनौती है।
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कैंट सीट भाजपा का गढ़ है और यहां से जीतना सपा के लिए बहुत मुश्किल है। इसके लिए सपा आलाकमान को कड़े कदम उठाने होंगे और विश्लेषण कर किसी मजबूत प्रत्याशी को ही टिकट देना होगा।
साइकिल की रफ्तार और जाति की राजनीति
समाजवादी पार्टी इस बार सिर्फ हवा बनाने के मूड में नहीं है बल्कि वह जमीन पर जातिवार आंकड़े लेकर उतर रही है। मेरठ की गलियों से सपा का यह दांव भाजपा के हिंदुत्व कार्ड के सामने एक बड़ी लकीर खींचने की कोशिश है। यदि पिछड़ों और दलितों का समर्थन वोट में तब्दील होता है तो 2027 की राह सपा के लिए आसान हो सकती है।
सेंट्रल मार्केट का मुद्दा भुनाने की कोशिश
सपा इस बार सेंट्रल मार्केट के मुद्दे को भी विधानसभा चुनाव में भुनाने की कोशिश करेगी। यही वजह है कि सपा मुखिया अखिलेश यादव विधानसभा में इस मुद्दे को उठा चुके हैं। कई बार सोशल मीडिया पर पोस्ट लिख चुके हैं। सपा विधायक अतुल प्रधान अक्सर सेंट्रल मार्केट में व्यापारियों के बीच खड़े मिलते हैं।
सपा के व्यापारी नेता शैंकी वर्मा और जीतू नागपाल व्यापारियों की आवाज बनने की कोशिश में हैं। सपा को लगता है कि व्यापारी भाजपा का बड़ा वोट बैंक है। सेंट्रल मार्केट का ध्वस्तीकरण व्यापारियों का बड़ा दर्द है। इसकी टीस का असर अगर विधानसभा चुनाव में दिखा तो न सिर्फ मेरठ की सीटों पर बल्कि प्रदेश की अन्य सीटों पर भी इसका असर पड़ सकता है।