याचिका के मुख्य बिंदु
इन महिलाओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में यह तथ्य रखा जाएगा कि छोटे मकानों में सेट बैक छोड़ने से उनके गिरने का गंभीर खतरा है। परिषद ने 1986 में कई मकान बनाकर दिए थे, जिनमें शुरू से सेट बैक का प्रावधान नहीं था। इसके अतिरिक्त, अल्प और दुर्बल आय वर्ग के मकानों में जीवन-यापन के लिए व्यापार करने का भी प्रावधान था। यह याचिका इन ऐतिहासिक तथ्यों को भी अदालत के सामने प्रस्तुत करेगी।
विभाग की कार्रवाई और समाधान
विभाग के अनुसार, 35 संपत्तियों के सेट बैक छोड़ने की कार्रवाई पूरी हो चुकी है। वहीं, 90 संपत्तियों में अवैध निर्माणों में ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया लगातार चल रही है। अधिकारियों का कहना है कि यदि सेट बैक छोड़ने में किसी को तकनीकी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है, तो विभाग उसका समाधान कराएगा। विभाग इस मामले में लोगों की समस्याओं को सुनने के लिए भी तैयार है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार इन दुकानदारों को दो सप्ताह का समय दिया गया है। यदि निर्धारित समय में निर्माण नहीं हटाया गया तो जिला प्रशासन ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करेगा और उसका खर्च भी दुकानदारों से ही वसूला जाएगा। बृहस्पतिवार को जब आवास विकास की टीम नोटिस चस्पा करने पहुंची थी तो महिलाओं ने कड़ा विरोध किया था।
महिलाओं ने न केवल नोटिस फाड़े थे बल्कि अधिकारियों को लौटने पर मजबूर भी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि सभी को नोटिस भेजा जाए। ऐसे में जिन भवनों पर नोटिस चस्पा नहीं हो सके हैं, उन्हें सोमवार से डाक के जरिए भेजा जाएगा।
उप आयुक्त आवास अनिल कुमार सिंह ने बताया कि स्कीम नंबर सात में 42 ऐसे मकान हैं, जिनमें सेट बैक छोड़ने का प्रावधान योजना के विकसित होने के दौरान नहीं किया गया। इनमें अधिकांश भवन कोने के हैं, जिनका फ्रंट बहुत कम है और चारों ओर से घिरे हैं।