एक नया दांव, नई चाल और नए समीकरण। जब इस शहर के क्रांतिकारियों ने अपनी जान की बाजी लगाई होगी, तो सोचा भी न होगा कि सियासत इस शहर की किस्मत से ऐसे खेलेगी। पहले प्रदेश सरकार ने छला और अब केंद्र सरकार ने नया दांव चल दिया।
प्रदेश और केंद्र सरकार की इस पशोपेश के पीछे दोनों के सियासी हित हैं। सपा की रायबरेली में विधानसभा में मजबूत स्थिति इसका कारण है, तो भाजपा अपनी नेता स्मृति ईरानी के कद को मजबूत करने के लिए रायबरेली को साधना चाहती है।
भाजपा के जनप्रतिनिधियों की ताकत आला नेताओं के सियासी तीरों के सामने कमजोर हो गई है। वहीं अब यह भी देखना होगा कि सपा के धुरंधर कहलाने वाले नेता क्या मेरठ के साथ न्याय करा पाएंगे।
दरअसल पहले दिन से ही स्मार्ट सिटी के चयन में मानकों के साथ राजनीति चल रही है। नगर निगम होने और कई क्षेत्रों में रायबरेली से कहीं आगे होने के बावजूद मेरठ को प्रदेश सरकार ने रायबरेली से पीछे 13बी पर रख दिया। तभी से सपा-भाजपा के खेल का अंदाजा हो गया था।
सपा की रायबरेली जिले से कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के साथ दोस्ताना राजनीति चलती रहती है। इसी कारण वहां लोकसभा प्रत्याशी खड़ा करने से भी गुरेज किया जाता है। प्रदेश सरकार के इस सियासी धोखे के बाद उम्मीद जगी कि भाजपा के दिग्गज नेता मेरठ को उसका हक दिलाएंगे।
प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी मेरठ में रहते हैं तो सांसद, मेयर और तीनों विधायक भी भाजपा से ही हैं। केंद्र में भाजपा की सरकार होने के कारण जनता को पूरी उम्मीद थी कि उनके जनप्रतिनिधि मेरठ के हक में फैसला कराके लाएंगे। लेकिन बृहस्पतिवार को केंद्र सरकार ने भी सियासी गुणा-गणित के कारण मेरठ की जनता की उम्मीदों को पलीता लगा दिया। भाजपा ने अपने नेताओं के कद की परवाह भी नहीं की। अब यह भी कहा जा रहा है कि स्मृति को बड़ा नेता प्रोजेक्ट करने के चक्कर में केंद्रीय नेतृत्व ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी और दो बार के सांसद राजेंद्र अग्रवाल सहित दूसरे जनप्रतिनिधियों को नजरअंदाज कर दिया।
अब प्रदेश सरकार को ही फैसला करना है कि वह मेरठ को स्मार्ट बनवाएगी या रायबरेली को। यह भी संभव है कि प्रदेश सरकार नया सियासी दांव चलते हुए फिर से केंद्र को ही दोनों में से किसी एक को चुनने का प्रस्ताव दे दे। यह भी देखना होगा कि सपा के कैबिनेट मंत्री और दर्जा प्राप्त मंत्रियों सहित नेताओं की लंबी फौज इस जंग में कौन सा ऐसा तीर चलाती है, जिससे मेरठ के हक में फैसला जाए।