दुल्हैंडी पर बिजौली में निकाले गए छह तख्त
खरखौदा। मेरठ मुख्यालय से करीब 11 किमी दूर स्थित गांव बिजौली में परंपरा निर्वहन और गांव को प्राकृतिक आपदा से बचाने के लिए दुल्हैंडी के दिन रंग खेलकर तख्त यात्रा निकाली गई। इस वर्ष अलग-अलग मोहल्ले से छह तख्त निकाले गए। प्रत्येक तख्त पर तीन-तीन युवकों को नुकीले औजारों से बेधा गया। इसके बाद इन सभी युवकों ने महात्मा गंगापुरी की समाधि पर पहुंचकर माथा टेका।
मोहल्ला चौक पर ब्रह्मदत्त फौजी के आवास से तख्त निकाला गया। जिसमें डैनी त्यागी, केशव त्यागी व रोहित त्यागी को नुकीले औजार से बेधा गया। मोहल्ला गोला कुआं चौक पर वीरेंद्र शर्मा के आवास से तख्त निकाला गया, जिसमें शुभम शर्मा, खुशी रामपाल व सुजीत जाटव को बेधा गया। मोहल्ला खेड़े वाले पर महेश त्यागी के आवास से तख्त निकाला गया, जिसमें प्रशांत त्यागी, कृष्ण कुमार और राहुल त्यागी को बेधा गया। मोहल्ला खेड़े वाले से ही दूसरा तख्त भी निकाला गया, जिसमें बेधे गए युवक निर्दोष त्यागी, सुबोध त्यागी व अर्जुन तीनों रहे। मोहल्ला धनोटिया से शिब्बा जाटव के आवास से तख्त निकाला गया, जिसमें रविंद्र, जग्गा व दीपक को बेधा गया। मोहल्ला पछायला में अज्जू त्यागी की आवास से तख्त निकाला गया, जिसमें मिंटू गिरी, लाला व अजय कुमार तीनों को बेधा गया। बैंडबाजे के साथ गांव के प्रत्येक गली-मोहल्ले से तख्त यात्रा निकाली गई। तख्त के आगे गांव के युवक लठबाजी व तलवारबाजी का करतब दिखाते हुए चल रहे थे। महात्मा गंगापुरी की समाधि पर पहुंचकर युवकों ने मत्था टेका, जिसके बाद यात्रा समाप्त हुई।
महात्मा ने दी थी यात्रा निकालने की सलाह
बिजौली के ग्रामीणों के अनुसार, करीब 700 वर्ष पूर्व गांव में अचानक अकाल, ओलावृष्टि, महामारी, अतिवृष्टि सहित कई आपदाएं आई। इस दौरान गांव से गुजर रहे गंगापुर नाम के एक महात्मा गांव में ही रुक गए। आपदाओं से आजिज आ चुके गांव के मराठा काल के राजा विजय सिंह ने महात्मा से इन आपदा से बचने के उपाय पूछे। महात्मा ने होली के दिन गांव में तख्त यात्रा निकालने की सलाह दी। युवकों को नुकीले औजार से मुंह, बाजू व पेट की खाल के आरपार निकालकर बेधा जाता है। घावों पर होलिका दहन की राख को दवा के रूप में लगाया जाने लगा।
परंपरा को छोड़ा तो आई कई आपदा
ग्रामीणों के अनुसार, तख्त निकालने की परंपरा लगातार चलती रही, लेकिन बीच में किन्हीं कारणों से ग्रामीणों ने परंपरा को छोड़ दिया। जिसके बाद गांव में फिर से फसलों में आगजनी, ओलावृष्टि, पशुओं में बीमारी आदि सहित कई घटनाएं होने लगी। ग्रामीणों ने फिर से इस परंपरा की शुरुआत की।
ड्रोन से की गई सुरक्षा
कई सौ वर्षों से निकाले जाने वाली इस तख्त यात्रा की सुरक्षा गांव के संभ्रांत व्यक्ति ही संभालते थे। चार वर्ष पहले यात्रा के दौरान त्यागी समाज व जाटव समाज में पथराव व फायरिंग हुई। जिसमें कई लोग घायल हुए थे। उसके बाद यात्रा की सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत की जा रही है। इस वर्ष तख्त यात्रा की निगरानी ड्रोन कैमरे से कराई गई। वही गांव में पुलिस बल भी मौजूद रहा।
हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल यात्रा
तख्त यात्रा में जिन औजारों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें गांव के ही मुस्लिम समाज के लोग तैयार करते हैं। औजार बनाने की तैयारी 15 दिन पहले ही शुरू हो जाती है। यह यात्रा हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक मानी जाती है।
आसपास के गांव और रिश्तेदार होते हैं इकट्ठा
तख्त यात्रा में बाहर नौकरी कर रहे लोग अपने परिवारों सहित घर लौटते हैं। इसके अलावा रिश्तेदार व आसपास के गांव के लोग भी इस यात्रा को देखने के लिए गांव में इकट्ठा होते हैं।