गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज में करीब 40 बच्चों की मौत के बाद भी यहां स्वास्थ्य महकमे के अधिकारियों की नींद नहीं टूट रही है। जिले में हेपेटाइटिस सी, मलेरिया और स्वाइन फ्लू से पीड़ितों की संख्या में इजाफा होने के बावजूद उनका उपचार यहां संभव नहीं है। इन रोगों से पीड़ितों को अपना उपचार कराने के लिए अन्य जिलों की ओर ही अपना रुख करना पड़ता है।
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जनपद में शामली, कैराना, थानाभवन, कांधला, ऊन, झिंझाना, कुड़ाना सीएचसी, 23 पीएचसी और 129 स्वास्थ्य उपकेंद्र हैं। शामली सीएचसी में प्रतिदिन 100 से ज्यादा बीमार बच्चे पहुंचते हैं, जिन्हें बुखार और अन्य बीमारियां होती हैं। प्रतिमाह की ओपीडी करीब 20,000 होती है। सीएचसी शामली में बिजली आपूर्ति ठप होने पर जेनरेटर की सुविधा तक नहीं है। कई साल पूर्व जेनरेटर खराब हो गया, जिसके बाद उसे ठीक तक नहीं कराया गया। जिले के कई स्वास्थ्य उपकेंद्र जर्जर हालत में हैं, जिनका उपयोग तक नहीं हो पा रहा है। यमुना खादर क्षेत्र में बीमारियों का प्रकोप रहता है, जिसके चलते बुखार और अन्य रोग फैलते हैं। वहीं, जिले में स्वाइन फ्लू, हेपेटाइटिस सी और डेंगू के मरीजों की जांच की सुविधा नहीं है। ऐसे मरीजों का ब्लड सैंपल परीक्षण के लिए मेरठ भेजवाया जाता है।
ये है जिले में बीमारियों का हाल
शामली के सरकारी अस्पतालों का हाल
जिले में हेपेटाइटिस सी की 60 मरीजों में पुष्टि हुई। मलेरिया की 82 मरीजों में पुष्टि हुई थी। इसके अलावा हाई रिस्क प्रेगनेंसी में 900 से ज्यादा महिलाएं चिह्नित हैं, तो कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों की संख्या भी कम नहीं है। वहीं, पिछले दिनों ही गांव हींड निवासी सीमेंट व्यापारी दिलशाद की स्वाइन फ्लू से दिल्ली स्थित अस्पताल में उपचार के दौरान मौत हुई। वहीं, झिंझाना के गांव नोनांगली निवासी पुष्पेंद्र को गाजियाबाद अस्पताल में मेडिकल परीक्षण में स्वाइन फ्लू की पुष्टि हो चुकी है।
अस्पतालों में बिजली की उचित सुविधा नहीं
गांव हरड़ फतेहपुर स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का बिजली कनेक्शन एक अगस्त से काट दिया गया। बकाया बिल भुगतान न होने की वजह से कनेक्शन कटा, लेकिन उसके बाद कनेक्शन जुड़वाने की जरूरत नहीं समझी गई। चिकित्सा केंद्र प्रभारी ने सीएमओ के साथ ही जिलाधिकारी को पत्र भेजकर कनेक्शन जुड़वाने की मांग की। साथ ही कहा कि बिजली आपूर्ति न होने से अस्पताल में रेफ्रीजरेटर नहीं चल रहा, जिस कारण वैक्सीन खराब होने की आशंका भी है। ऐसी ही स्थिति अन्य अस्पतालों की भी बनी हुई है।
स्वाइन फ्लू को लेकर जिले में अलर्ट
स्वाइन फ्लू से सावधान
स्वाइन फ्लू के बढ़ते मामलों को देखते हुए शासन ने इस बीमारी की रोकथाम और बचाव को लेकर दिशा निर्देश जारी किए हैं। इसके चलते स्कूलों में बच्चों की प्रार्थना सभा न कराने और आवश्यक सावधानी बरतने को कहा गया है। शासन स्तर से सचिव वी हेकाली झिमोमी ने शुक्रवार को दिशा निर्देश जारी किए। उसमें कहा कि स्वाइन फ्लू की रोकथाम और बचाव के लिए स्कूलों में प्रभावी नियम लागू करने आवश्यक हैं। इस संबंध में गत पांच अगस्त को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के मंत्री ने भी बैठक लेकर निर्देश जारी किए थे। इसी परिप्रेक्ष्य में कहा गया है कि जब तक स्वाइन फ्लू का प्रकोप रहता है, तब तक स्कूलों में प्रार्थना सभा में बच्चों को इकट्ठा न किया जाए। जिन बच्चों में फ्लू के लक्षण पाए जाएं, उन्हें तत्काल घर भेजकर उनके अभिभावकों को फ्लू की तत्काल जांच और स्वाइन फ्लू पॉजीटिव पाए जाने पर मुख्य चिकित्साधिकारी से संपर्क कर परामर्श दिया जाए। बच्चों को स्वाइन फ्लू से बचाने हेतु नियमित रूप से साफ सफाई तथा भीड़ वाले क्षेत्रों में जाने से बचाने की सलाह दी जाए। स्वाइन फ्लू के मरीज के समीप या उसके कमरे में जाते समय अनिवार्य रूप से मास्क का प्रयोग करने तथा रोगी द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तुओं को छूने पर हाथों को साबुन और पानी से अच्छी तरह धुलने की जानकारी दी जाए। इस संबंध में जिलाधिकारी ने सीएमओ, जिला विद्यालय निरीक्षक और बेसिक शिक्षा अधिकारी को निर्देश जारी कर दिया है।
अस्पतालों में मरीजों को उचित चिकित्सा सुविधा दिलाई जा रही है। समय समय पर अस्पतालों का निरीक्षण किया जाता है। जिले के प्रत्येक सीएचसी और पीएचसी पर ऑक्सीजन की सुविधा उपलब्ध है।
- सफल कुमार, अपर मुख्य चिकित्साधिकारी
शामली अस्पताल सिर्फ एफआरयू यूनिट है, लेकिन जिला अस्पताल के बराबर काम रहा है। अल्ट्रासाउंड सुविधा के लिए रजिस्ट्रेशन फाइल भेजी गई है, लेकिन अभी तक रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाया है
-डाक्टर जगमोहन, चिकित्साधीक्षक, सीएचसी शामली।
आज तक नहीं मिली सिक न्यू बॉर्न केयर यूनिट की सुविधा
गोरखपुर जैसी ही है इस जिले के अस्पतालों का हाल
जिले में स्वास्थ्य सेवाएं रामभरोसे हैं। जिला बने सात साल हो गए, लेकिन जिला अस्पताल आज तक अस्तित्व में नहीं आ सका। जिला बनने के बाद जहां एसएनसीयू (सिक न्यू बॉर्न केयर यूनिट) की सुविधा मिलनी चाहिए थी, मगर अभी तक एनबीएसयू (न्यू बॉर्न सिक यूनिट) से काम चलाना पड़ रहा है। नतीजतन ज्यादातर केसों को मुजफ्फरनगर या मेरठ रेफर करना पड़ता है।
शामली को जिला बने सात साल व्यतीत हो गए। जिला बनने के बाद से शामली अस्पताल जिला अस्पताल के रूप में काम कर रहा है, लेकिन सुविधा और संसाधनों के लिहाज से शामली अस्पताल काफी पीछे है। अस्पताल में रोजाना छह सौ से लेकर 800 तक ओपीडी के मरीज आते हैं। रोजाना औसतन 10 डिलीवरी होती हैं। हादसों में घायल लोगों को एफआरयू यूनिट होने के कारण शामली सीएचसी में लाया जाता है, मगर उनमें से 80 प्रतिशत को रेफर कर दिया जाता है। इसके अलावा डिलीवरी को आने वाली महिलाओं में मेजर ऑपरेशन के लिए मुजफ्फरनगर जिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता है। क्या है एनबीएसयू न्यू बोर्न सिक यूनिट के रूप में शामली अस्पताल काम कर रहा है, जबकि जिला अस्पताल में एसएनसीयू यानि सिक न्यू बोर्न केयर यूनिट होती है। बच्चों के उपचार के लिहाज से एनबीएसयू पर प्राथमिक सामान्य डिलीवरी और सामान्य आपरेशन होता है। यहां सिर्फ फोटो थेरेपी मशीन तथा रेडिएंट वार्मर की सुविधा होती है।
शामली अस्पताल में डिलीवरी के दौरान जो बच्चे पैदा होते है, यहां पर उनको मैन्युअल आक्सीजन लगाया जाता है, लेकिन यहां पर इंसुवेटर नहीं है। इंसुवेटर लगाने के बाद जब तक सिलेंडर में ऑक्सीजन है, उस समय तक बच्चे की मौत ऑक्सीजन की कमी नहीं होगी।
प्री मेच्योर यानि जो बच्चे समय से पूर्व ही जन्म लेते हैं तथा दो किलो से कम वजन वाले बच्चों को उपचार देने के लिए यहां पर कोई सुविधा नहीं है। अस्पताल में अल्ट्रासाउंड की कोई सुविधा नहीं है। इसके अलावा मेजर सर्जरी के लिए जो संसाधन होने चाहिए उनका भी यहां अभाव है।
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