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रामलीला में पिता से सीखे गुर, फिर दुनिया में बनाई नई पहचान, ये रही अब तक की फिल्में

Fri, 12 Oct 2018 03:15 PM IST
आनंद प्रकाश, अमर उजाला, शामली
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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पिता से सीखी रामलीला में मंचन की कला। कभी राम बने, तो कभी लक्ष्मण। रंगमंच की कला का जादू ऐसा चढ़ा कि शामली की तंग गलियों से निकलकर मुंबई पहुंच गए योगेश भारद्वाज। मशहूर फिल्म निर्देशक जेपी दत्ता के साथ फिल्में बनाने का गुर सीखा और फिर खुद निर्देशक के रूप में कई फिल्में बनाईं। वह 37 साल से मुंबई में रहते हैं और फिल्म उद्योग से जुड़े हैं, लेकिन शामली के रामलीला मंचन की यादें आज भी जेहन में ताजा हैं।  

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योगेश भारद्वाज शामली के मोहल्ला ब्राह्मणान के रहने वाले हैं। अमर उजाला संवादताता से फोन पर विशेष बातचीत में योगेश भारद्वाज ने बताया कि 17 साल की उम्र में पहली बार शामली के हनुमान धाम पर रामलीला में भरत का किरदार निभाया था। तब उनके पिता पंडित राजेश्वर प्रसाद भारद्वाज दशरथ का किरदार निभाते थे। पिता को देखकर ही उन्होंने रंगमंच की कला सीखी थी। कई साल तक रामलीला में मंचन किया और जब लगा कि कला क्षेत्र को अपना भविष्य बनाया जाए, तो अपने सपनों को पूरा करने के लिए मुम्बई पहुंच गए। 1993 में भी वह जब शामली आए थे तो रामलीला में राम का किरदार निभाया था। 

योगेश भारद्वाज बताते हैं कि उस दौर की रामलीला अलग ही होती थी। रामलीला देखने श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती थी। श्रवण को बाण लगने, राम-भरत मिलाप हो या फिर सीता हरण और दशरथ के मरण का दृश्य, उन्हें देखकर दर्शकों की आंखें भर आती थीं। तब रामलीला देखने वालों में राम के प्रति भाव होता था, लेकिन धीरे धीरे रामलीला के प्रति लोगों में भाव का अभाव हो गया, जिस कारण अब रामलीला में उतनी भीड़ नहीं पहुंचती है।

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भारद्वाज परिवार के कलाकार
योगेश भारद्वाज के अलावा उनके पिता पंडित राजेश्वर प्रसाद भारद्वाज, बड़े बाई कृष्णकांत भारद्वाज, मनमोहन भारद्वाज, विजय भारद्वाज और राकेश भारद्वाज भी रामलीला के मंचन में अभिनय करते रहे हैं। एक भाई विजय शामली में नेहरु मार्केट में फोटो स्टूडियो चलाते हैं। बताया कि उन्होंने करीब 15 साल तक रामलीला में अभिनय किया। 

बॉलीवुड का सफर
योगेश भारद्वाज बताते हैं कि उन्होंने 12 वीं तक की पढ़ाई शामली के वीवी इंटर कॉलेज से की थी। रामलीला के मंच से उन्हें कला का शौक लगा, जिसने उन्हें 1980 में मुंबई पहुंचा दिया। 1997 में उन्होंने जेपी दत्ता की फिल्म बॉर्डर में मुख्य सहायक डायरेक्टर के रूप में कार्य किया। फिर वर्ष 2000 में रिफ्यूजी फिल्म में भी मुख्य सहायक डायरेक्टर रहे। 2003 में खुद के निर्देशन में पहली फिल्म बॉर्डर हिन्दुस्तान का बनाई। 2005 में शबनम मौसी और 2007 में मिस अनारा बनाई। इसके बाद 2012 में दलितों के उत्पीड़न पर फिल्म दाह बनाई।

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