गोविंद ढोलकिया और उनके मित्र दास मामा ने शनिवार को सर्किट हाउस में पत्रकारों से वार्ता की। अपने अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि साल 1991 में देश के सबसे गंदे शहर सूरत में हमने स्वच्छता की अलख जगाने का निर्णय लिया था। अपना सूरत शहर बहुत गंदा था। रहने लायक नहीं था। हम दूसरे शहरों में जाने का प्लान करते थे। लेकिन एक दिन हमने सोचा कि हमने अपने शहर के लिए क्या किया।
काफी मंथन के बाद निर्णय लिया कि प्रत्येक रविवार को हम दोनों लोग अपनी सोसायटी के बाहर सड़क पर सफाई करेंगे। हमें सड़क पर सफाई करते देखकर दूसरे सप्ताह चार लोग ह्रो गए। दो माह में 250 लोग जुड़ गए। एक दिन आया कि पूरा शहर स्वच्छता को लेकर जागरूक हो गया। हमने संस्था का नाम ‘क्लीयरिटी मिस क्लीन’ रखने का निर्णय लिया। सभी सदस्यों को कमांडो का नाम दिया गया। चार साल के भीतर यानी 1995 तक संस्था से शहर की 300 सोसायटी जुड़ गयी। संस्था ने अपने ही संसाधनों से शहर में सफाई शुरू की। राष्ट्रगीत के साथ स्वच्छता का काम शुरू करते थे। हम तो जनता में स्वच्छता की चिंगारी देते थे, जिसका परिणाम सूरत में दिखता है।
गोविंद ढोलकिया ने बताया कि सूरत शहर की सूरत बदलने में नरेंद्र भाई मोदी और म्युनिसिपैलिटी कमिश्नर का बड़ा सहयोग मिला था। कमिश्नर ने तीन साल में आठ लाख पौधे शहर में लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया था। उन्होंने संस्था के साथ स्वच्छता का काम किया था। सड़कों पर अतिक्रमण करने वाले लोगों ने स्वयं ही अपने भवनों के अवैध निर्माण तोड़ने शुरू कर दिए थे। सूरत शहर ग्रीन एंड क्लीन के हिसाब से दस साल तक दूसरे स्थान पर रहा। हालांकि अब नीचे चला गया है। अब हम फिर से जागरूक हो रहे हैं। एक बार शहर में इतना जलभराव हुआ कि शहर के जागरूक लोगों ने चार दिन का अभियान चलाया। जलभराव से मुक्ति दिलाने के लिए आगे आए।
सरकारी मशीनरी को भी आनी चाहिए शर्म
ढोलकिया ने कहा कि अगर आप सोचें कि सरकार आपके शहर को साफ करेगी तो ऐसा नहीं होगा। करना तो यहां की जनता को भी पड़ेगा। नगर निगम को भी शर्म लगनी चाहिए। अगर शहर की जनता स्वच्छता पर काम करे तो सरकारी मशीनरी को भी आगे आना होगा। क्योंकि कुछ जगह पर प्राइवेट लोगों को सरकारी सिस्टम की जरूरत पड़ती है। ऐसे ही शहर स्वच्छ होगा। इस अवसर पर क्लीन मेरठ के अमित गुप्ता भी मौजूद रहे।