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संस्कृत अनेक भाषाओं की जननी : वाचस्पति मिश्र

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जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में चल रहे भाषा समर कैंप में मंचासीन अतिथि। (स्त्रोत डायट) मव
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मवाना। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में चल रहे भारतीय भाषा समर कैंप (संस्कृत भाषा) का मंगलवार को समापन हो गया। वाचस्पति मिश्र ने कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, जीवन दर्शन है।
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महात्मा गांधी प्रेक्षागृह, जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में चल रहे भारतीय भाषा समर कैंप के अंतिम दिवस का शुभारंभ डायट प्राचार्य मनोज कुमार आर्य, कैंप प्रभारी नरेश कुमार, डायट स्टाफ, मुख्य अतिथि वाचस्पति मिश्र (संस्कृत विभागाध्यक्ष, मेरठ कॉलेज), देवेंद्र पंड्या (संगठन मंत्री, संस्कृत भारती), राजमणि त्रिपाठी, अजय पेन्यूली, आचार्या नीलू राय, पूनम वर्मा (संस्कृत भारती) आदि संस्कृत विद्वानों की उपस्थिति रही।
मुख्य अतिथि वाचस्पति मिश्र ने कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, जीवन दर्शन है। यह एक ऐसी सांस्कृतिक थाती है, जो आत्मानुशासन, इन्द्रिय-नियंत्रण, चित्त की शांति एवं मानवीय मूल्यों की शिक्षा देती है। अंग्रेजी सहित अनेकों भाषाओं की जड़ें संस्कृत में हैं। यह भाषा जैसे लिखी जाती है, वैसे ही बोली जाती है। जिससे भाषा अधिगम में सहजता आती है। देवेंद्र पंड्या ने संस्कृत की दैनिक जीवन में उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए सरल संस्कृत संवादों और बोलचाल की विधियों का अभ्यास कराया।
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आचार्या नीलू राय ने विद्यार्थियों की कठिनाइयों को समझते हुए बताया कि विभिन्न भाषिक गतिविधियों, समूह कार्यों और खेलों द्वारा संस्कृत सीखना सरल और रुचिकर बनाया जा सकता है। आचार्य अजय पेन्यूली ने कहा कि संस्कृत के माध्यम से कला, संगीत, नृत्य और शिल्प जैसे क्षेत्रों में व्यक्तित्व विकास संभव है।
कार्यक्रम प्रभारी नरेश कुमार ने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि कोई भी नयी भाषा जब हम आत्मसात करते हैं, तो हम न केवल शब्द, बल्कि संस्कृति, दृष्टिकोण और आत्मबल भी ग्रहण करते हैं। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों को प्रशस्ति पत्र प्रदान किए गए एवं संस्कृत भाषा के महत्व, एकता, एकाग्रता एवं आत्मविकास पर आधारित प्रेरणादायक श्लोकों का उच्चारण किया गया।
डायट प्राचार्य ने कहा कि सात दिवसीय समर कैंप विद्यार्थियों के भाषा विकास, कौशलात्मक विकास, चारित्रिक मजबूती एवं रचनात्मक विस्तार का सशक्त माध्यम रहा। जहां बच्चों ने खेलकूद, नाट्य, गीत-संगीत एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से संस्कृत भाषा को आत्मसात किया।
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