आचार्य निशंक भूषण महाराज का समाधि मरण किया गया
हस्तिनापुर। प्राचीन दिगंबर जैन बड़ा मंदिर पर विराजित आचार्य श्री 108 निशंक भूषण महाराज शनिवार रात आत्मध्यान में लीन हो गए। उसके बाद संतों के सानिध्य में उनका समाधि मरण किया गया।
समाधि मरण के दौरान आचार्य भारत भूषण, आचार्य संयम सागर, महाराज, मुनि प्रणम्य सागर महाराज, मुनि चंद्र सागर, मुनि भाव भूषण, मुनि भव्य भूषण एवं आर्यिका 105 चंदनामती माता एवं आर्यिका 105 विद्या माता के आदि संतों रहे। भक्तों ने गुरु की डोली को अपने कंधों पर विराजमान कर जयकारे लगाते हुए प्रथम निशायां पर गुरु का मृत्यु महोत्सव मनाया। डोली उठाने का सौभाग्य सुशील जैन, पंकज जैन, निखिल जैन, संजीव जैन, राकेश जैन, राकेश जैन आदि को प्राप्त हुआ। निशंक भूषण गुरु के परिवार से गृहस्थ जीवन के बेटों में अतुल जैन, बिजेंद्र जैन व अन्य भक्तों ने अग्निकुंड बनाकर एवं गुरु की पूजा कर पुण्य का संचय किया। समाधि मरण की समस्त क्रियाएं पंड़ित आशीष जैन शास्त्री व पंडित नरेश कांसल ने संपन्न कराई।
इस मौके पर तीर्थ क्षेत्र कमेटी के महामंत्री मुकेश जैन सराफ, कोषाध्यक्ष राजेंद्र कुमार जैन, मंत्री राजीव जैन, विजय कुमार जैन, सुनील जैन, सुनील कुमार जैन प्रवक्ता, प्रमोद जैन, राजेंद्र जैन, संजय जैन, अखिलेश जैन, सुशील जैन, सौरभ जैन व अन्य भक्तों ने पुण्य का संचय किया।
सिंचाई विभाग से 2005 में हुए सेवानिवृत्त
प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर के प्रबंधक मुकेश जैन ने बताया कि आचार्य निशांत भूषण महाराज गृहस्थ जीवन में सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त होकर संयम के मार्ग पर आगे बढ़े। 25 जुलाई, 2005 को आचार्य ज्ञान भूषण महाराज ने कांधला में उन्हें दीक्षा दी। वह हस्तिनापुर में रहकर साधना कर रहे थे।
समतापूर्वक देह को छोड़ना समाधि मरण
मुनि भाव भूषण महाराज ने कहा कि वे मुनि धन्य हैं, जिन्होंने समाधि मरण ग्रहण करके दर्शन, ज्ञान, चरित्र व तप कर आराधना रूपी पताका को फहराया। वे ही भाग्यशाली और ज्ञानी हैं, जिन्होंने दुर्लभ भगवती आराधना (संलेखना) को प्राप्त किया। संलेखना में बाह्य शरीर और आंतरिक कार्यों का त्याग करके समतापूर्वक देह को छोड़ना समाधि मरण है।