भागवत ने कहा कि गौ आधारित जैविक खेती हमारी परंपरा है। इससे हमारी प्रतिष्ठा है। इसे अनुशासन के साथ अपनाएं। अंग्रेजों के लिए उन्होंने कहा कि जिनसे हमने स्वतंत्रता ली, उनके साम्राज्य पर सूर्य अस्त नहीं होता था, लेकिन 1857 में भारतीय अपने सारे भेद व स्वार्थ भूलकर एक हो गए। इस पर अंग्रेजों को कूटनीति करनी पड़ी। संस्कृति नष्ट करने की कोशिश की।
पहले पत्थरों से भवन बनते थे तो उन्होंने नियम बना दिया कि अब जो भी भवन बनेगा, वह इंग्लैंड के पोर्टलैंड सीमेंट का बनेगा। इससे महाराष्ट्र में 30 हजार परिवार बेरोजगार हो गए। उन्होंने आवाज उठाई तो उन्हें अपराधी ठहरा दिया जाता था।
किसान हैं भारतवर्ष के प्राण
भागवत ने कहा कि भारत की प्रतिष्ठा जो दुनिया में है वह खेत और जंगल से ही है। बेहतर खेती से दुनिया और गति से आगे बढ़ सकेगी। किसान भारतवर्ष के प्राण हैं, यह सारी दुनिया के लिए हैं। खेती किसानों की प्रयोगशाला है। सदियों के अनुभव से यह ज्ञान मिला है। ज्ञान शास्वत है सत्य है। भूमि से उतना ही लीजिए जितनी आवश्यकता है। पश्चिमी देशों की जमीन इतनी उपजाऊ नहीं हैं। इतनी औषधियां, वनस्पति वहां नहीं हैं। दुनिया भारत की तरफ देख रही है। सीखना चाहती है। हम भी सिखाना चाहते हैं। ऐसी कृषि ही सृष्टि का भी दोहन न हो और किसान का भी शोषण न हो। प्रत्येक नागरिक की स्वतंत्रता बनी रहे। भारत में हो रही गौ आधारित खेती को तीन देशों ने मान लिया है और उसकी सराहना की है।
अब वैज्ञानिक भी मानने लगे
भागवत ने कहा कि रसायन के ज्यादा प्रयोग से होने वाली बीमारियों और खराब होती जमीन के बारे में अब से 30-40 साल पहले वैज्ञानिक भी नहीं मानते थे, लेकिन वे भी अब मानने लगे हैं। हालांकि ऐसा बिल्कुल नहीं है, जो पुराना है सब अच्छा है और जो नया है वह सब खराब है। सही तरीका यह है कि उसकी परीक्षा कर फिर उसे अपनाएं।