रोडवेज परिचालक सवारियों को बेटिकट यात्रा कराकर जहां अपनी जेब भरते हैं, वहीं विभागीय राजस्व को भारी क्षति पहुंचाते हैं। विभाग ने इनकी पकड़ करने के लिए आरएम से लेकर एमडी स्तर तक फ्लाइंग स्क्वायड बना रखा है, जो बसों को चेक कर विदाउट टिकट में परिचालकों को पकड़ता है। स्क्वायड अपनी रिपोर्ट संबंधित एआरएम, आरएम और एमडी को सौंपता है।
मेरठ रोडवेज रीजन में 1997 से लेकर 2010 तक हुए विदाउट टिकट के 950 प्रकरणों की शिकायत की गई थी। 30 से 40 विदाउट टिकट में पकड़े जाने वालों पर संबंधित अधिकारियों द्वारा कार्यवाही न करके उन्हें मलाई वाले रूट देने की बात कही गई थी। तत्कालीन रोडवेज एमडी मुकेश मेश्राम ने जांच कराई थी। जांच में पाया गया कि 1997 से 2010 तक किसी भी आरएम ने कार्रवाई नहीं की और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जाता रहा।
एमडी पी. गुरुप्रसाद ने जांच रिपोर्ट के आधार पर यहां तैनात रहे आठ अधिकारियों को चार्जशीट जारी कर दी है। लेकिन मामला इससे बड़ा है। अमर उजाला ने मामले की तहकीकात की तो बताया गया कि उक्त प्रकरण की जांच के दौरान भी विदाउट टिकट का भ्रष्टाचार होता रहा।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, इस तरह के प्रकरणों की फाइलें 950 नहीं, बल्कि 2100 तक हैं। इनमें भी 400 प्रकरण तो ऐसे हैं, जिन पर अधिकारी स्तर से कोई कार्यवाही शुरू ही नहीं हुई है।
950 प्रकरणों का मामला मेरे कार्यकाल से पहले का है। मैं इसमें कोई कमेंट नहीं कर सकता। मेरे समय जो भी इस तरह का प्रकरण सामने आ रहा है, उस पर कार्रवाई की जा रही है। - नीरज सक्सेना, आरएम रोडवेज रीजन मेरठ