rahat indori
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थोड़ा रूमानी होते हुए राहत इंदौरी ने अपनी शायरी कुछ यूं आगे बढ़ाई कि ‘अपना आवारा सर झुकाने को तेरी दहलीज देख लेता हूं, और फिर कुछ दिखाई दे कि ना दे काम की चीज देख लेता हूं’। आगे सुनाया कि ‘तेरी परछाई मेरे घर से नहीं जाती है, तू कहीं हो मेरे अंदर से नहीं जाती है, एक मुलाकात का जादू उतरता ही नहीं, तेरी खुशबू मेरी चादर से नहीं जाती है’।