पूजा-पाठ का सौ गुना फल देता है पुरुषोत्तम मास
मेरठ। प्रत्येक तीन साल में पुरुषोत्तम मास, अधिकमास व मल मास का प्राकट्य होता है। इसका हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। हिंदू धर्मपरायण पुरुषोत्तम मास में पूजा पाठ, भगवतभक्ति, उपवास, जप भजन, कीर्तन आदि में रहते हैं।
मान्यता के अनुसार पुरुषोत्तम मास में किए गए धार्मिक कार्यों का सौ गुना अधिक फल मिलता है। हर साल पितृ पक्ष के समापन के अगले दिन से नवरात्र शुरू हो जाता है। घट स्थापना के साथ 9 दिन तक नवरात्र की पूजा होती है। इस बार श्राद्ध पक्ष समाप्त होते ही पुरुषोत्तम मास शुरू हो जाएगा। इस साल दो अश्विन मास होंगे। अश्विन में श्राद्ध, नवरात्र, दशहरा आदि होते हैं।
तीन वर्ष में करीब एक माह का अंतर
इंडियन काउंसिल ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल साइंस के संयुक्त सचिव आचार्य कौशल वत्स ने बताया कि एक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब छह घंटे का होता है। वहीं, एक चंद्र वर्ष 354 दिन का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिन का अंतर होता है। यह अंतर हर तीन वर्ष में लगभग एक माह के बराबर हो जाता है। इसे दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अतिरिक्त आता है। इसे अधिकमास, पुरुषोत्तम या मलमास का नाम दिया है।
अधिकमास को कहते हैं पुरुषोत्तम मास
आचार्य मनीष स्वामी ने बताया कि अधिकमास सूर्य और चंद्र मास में संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुआ तो इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई देवता तैयार नहीं हुआ। ऐसे में ऋषि-मुनियों द्वारा भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मास का भार अपने ऊपर लें। भगवान विष्णु ने इसे स्वीकार कर लिया। इस प्रकार यह पुरुषोत्तम मास भी बन गया।
शुभ कार्य पर रहती है पाबंदी
इंडियन काउंसिल ऑफ एस्ट्रोलोजिकल साइंसेज के केंद्र समन्वयक आचार्य मनीष स्वामी ने बताया कि अधिकमास के दौरान नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और सामान्य धार्मिक संस्कार गृहप्रवेश, नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीद आदि वर्जित रहते हैं।
आध्यात्म से जुड़े कार्य करें
अधिकमास में पौराणिक सिद्धांतों के अनुसार इस मास में यज्ञ, हवन, श्रीमद् भागवत, श्रीभागवत पुराण, श्रीविष्णु पुराण, भविष्योतर पुराण आदि का श्रवण, पठन, मनन विशेष रूप से फलदायी होता है।