अपने संस्कार पर पूरा भरोसा था : पिता
शहीद के पिता सोहनपाल के अनुसार चारों भाइयों का ये प्यार और त्याग देख उन्हें सुकून है कि उनके संस्कार बच्चों में हैं। बेटों की एक दूसरे के प्रति त्याग की भावना के कारण उन्हें भी नौकरी के लिए एक सदस्य का नाम तय करने में काफी समय लगा। बाद में चारों भाईयों ने मिलकर सुनील का नाम तय किया और फार्म भरकर एसडीएम के यहां भेज दिया गया।
शहीद बेटे की तस्वीर के आगे गुमसुम बैठ पिता ने बताई मन की बात
गुरुवार दोपहर करीब तीन बजे अमर उजाला टीम जब अमित के घर पहुंची तो उसके पिता अपने शहीद बेटे अमित की फोटो के आगे बैठे थे। बार बार उसकी फोटो निहार रहे थे। आंखें नम थीं और दिल में बेटे की यादें। हमने अमित की बात छेड़ी तो भावुक हो गए। बोले अमित घर के मुखिया वे जरूर हैं, लेकिन अमित ने मुखिया से भी बड़ी जिम्मेदारी अपने सिर ले रखी थी। उसकी नौकरी के बाद उसके दो बड़े और दो छोटे भाई सब खाली थे। दो भाई अर्जुन फोटोग्राफी कर कुछ कर लेता था। सुनील प्राइवेट नौकरी करता था जबकि अनिल प्राइवेट टीचर। बड़े भाई प्रमोद का कोई खास काम नहीं था। उसने अपने वेतन से बड़े भाई को गुुरुद्वारे पर बिजली की दुकान कराई। जब भी आता घर में सबके लिए कुछ ना कुछ लाता था। वो हर किसी का चहेता था। मोहल्ले वाले भी उसके आते ही मिलने आ जाते थे।
समाधि स्थल पर भंडारा करेंगे
शहीद के पिता ने बताया कि अमित हनुमान और साईंभक्त था। फरवरी में जब वो छुट्टी पर चल रहा था तो सात फरवरी को ही उसने साईं मंदिर में भंडारा किया था। इसके बाद वो छुट्टी पूरी कर गया और 14 फरवरी को वो शहीद हो गया। वे चाहते हैं कि उसकी समाधि स्थल पर वे भी बड़ा भंडारा करें।
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