मेरठ। आर्यसमाज के विद्वान एवं गुरुकुल प्रभात आश्रम के संस्थापक स्वामी समर्पणानंद के 125वें जन्म दिवस पर शनिवार को गुरुकुल प्रभात आश्रम द्वारा वेबिनार का आयोजन किया गया।
यहां आर्य जगत के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वानों ने स्वामी जी से जुड़े संस्मरण एवं उनके द्वारा किए गए कार्यों का वर्णन किया। गोष्ठी की अध्यक्षता कुलाधिपति गुरुकुल प्रभात आश्रम स्वामी विवेकानंद सरस्वती जी महाराज ने की। सर्वप्रथम सभी विद्वानों का परिचय एवं स्वागत मंत्री, गुरुकुल प्रभात आश्रम डॉ. वाचस्पति मिश्र ने किया। आर्यसमाज के वयोवृद्ध इतिहासकार प्रो. राजेंद्र जिज्ञासु ने कहा कि गुरुकुल कांगड़ी से शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने रक्त साक्षी पं लेखराम की कर्मस्थली एवं आर्यसमाज के घोर विरोधी मिर्जा गुलाम अहमद के कादियान में वैदिक धर्म की हुंकार भरी। वह श्रेष्ठ वक्ता, महान कवि, लेखक एवं संगीतज्ञ थे।
परोपकारिणी सभा अजमेर के उपप्रधान ओममुनि जी ने बताया कि जब भी महर्षि दयानंद अथवा आर्यसमाज पर किसी ने आक्षेप किया स्वामी समर्पणानंद ने तुरंत प्रतिवाद किया। उन्होंने जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ को शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी। महर्षि पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. महावीर अग्रवाल ने बताया कि स्वामी समर्पणानंद ने शतपथ ब्राह्मण का भाष्य कर ज्ञान का अगाध सागर प्रस्तुत किया है। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. सुरेंद्र कुमार ने कहा कि स्वामी जी ने वैदिक सामाजिक व्यवस्था के संबंध में जो चिंतन दिया वह समाज कल्याण एवं निर्माण में अत्यंत उपयोगी एवं प्रासंगिक है। उन्होंने दलित उत्थान के लिए भी व्यवहारिक रूप से कार्य किया। डॉ. सोमदेव शतांशु ने कहा उनके द्वारा स्थापित गुरुकुल प्रभात आश्रम उनके शिष्य श्रद्धैय स्वामी विवेकानंद सरस्वती जी के मार्गदर्शन में समाज एवं राष्ट्र की सेवा कर रहा है। यहां गुरुकुल कांगड़ी से डॉ. वेदव्रत एवं गुरुकुल प्रभात आश्रम से नीतीश, प्रबंधक दिव्यरंजन आदि रहे।